True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

46- आपका इरषादे गिरामी (जब शाम की तरफ़ जाने का इरादा फ़रमाया और इस दुआ को रकाब में पांव रखते हुए विर्दे ज़बान फ़रमाया)

ख़ुदाया मैं सफ़र की मषक्क़त और वापसी के अन्दोह व ग़म और अहल-व-माल-व-औलाद की बदहाली से तेरी पनाह चाहता हूँ। तू ही सफ़र का साथी है और घर का निगराँ है के यह दोनों काम तेरे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता है के जिसे घर में छोड़ दिया जाए वह सफ़र में काम नहीं आता है और जिसे सफ़र में साथ ले लिया जाए वह घर की निगरानी नहीं कर सकता है।

सय्यद रज़ी- इस दुआ का इब्तेदाई हिस्सा सरकारे दो आलम (स0) नक़ल किया गया है और आखि़री हिस्सा मौलाए कायनात की तज़मीन का है जो सरकार (अ0) के कलेमात की बेहतरीन तौज़ीअ और तकमील है ‘‘ला यहमाहमा ग़ैरक’’

47- आपका इरषादे गिरामी (कूफ़े के बारे में)

ऐ कूफ़ा! जैसे के मैं देख रहा हूँ के तुझे बाज़ार अकाज़ के चमड़े की तरह खींचा जा रहा है। तुझ पर हवादिस के हमले हो रहे हैं और तुझे ज़लज़लों का मरकब बना दिया गया है और मुझे यह मालूम है के जो ज़ालिम व जाबिर भी तेरे साथ कोई बुराई करना चाहेगा परवरदिगार उसे किसी न किसी मुसीबत में मुब्तिला कर देगा और उसे किसी क़ातिल की ज़द पर ले आएगा।

48- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जो सिफ़्फ़ीन के लिये कूफ़े से निकलते हुए मक़ामे नख़लिया पर इरषाद फ़रमाया था)

परवरदिगार की हम्द है जब भी रात आए और तारीकी छाए या सितारा चमके और डूब जाए। परवरदिगार की हम्दो सना है के उसकी नेमतें ख़त्म नहीं होती हैं और उसके एहसानात का बदला नहीं दिया जा सकता। 

अम्माबाद! मैंने अपने लश्कर का हरावल दस्ता रवाना कर दिया है और उन्हें हुक्म दिया है के इस नहर के किनारे ठहर कर मेरे हुक्म का इन्तेज़ार करें। मैं चाहता हूँ के इस दरियाए दजला को अबूर करके तुम्हारी एक मुख़्तसर जमाअत तक पहुँच जाऊँ जो एतराफ़े दजला में मुक़ीम हैं ताके उन्हें तुम्हारे साथ जेहाद के लिये आमादा कर सकूँ और उनके ज़रिये तुम्हारी क़ूवत में इज़ाफ़ा कर सकूँ।

सय्यद रज़ी- मलतात से मुराद दरिया का किनारा है और असल में यह लफ़्ज़ हमवार ज़मीन के मानों में इस्तेमाल होता है। नुत्फ़े से मुराद फ़ुरात का पानी है और यह अजीबो ग़रीब ताबीरात में है। 

(((इस जमाअत से मुराद अहले मदायन हैं जिन्हें हज़रात (अ0) इस जेहाद में शामिल करना चाहते थे और उनके ज़रिये लष्कर की क़ूवत में इज़ाफ़ा करना चाहते थे। ख़ुत्बे के आगणऩाज़ में रात और सितारों का ज़िक्र इस अम्र की तरफ़ भी इषारा हो सकता है के लष्करे इस्लाम को रात की तारीकी और सितारे के ग़ुरूब व ज़वाल से परेषान नहीं होना चाहिए। नूरे मुतलक़ और ज़ियाए मुकम्मल साथ है तो तारीकी कोई नुक़सान नहीं पहुँच मार्गँचा सकती है और सितारों का क्या भरोसा है। सितारे तो डूब भी जाते हैं लेकिन जो परवरदिगार क़ाबिले हम्दो सना है उसके लिये ज़वाल व ग़ुरूब नहीं है और वह हमेषा बन्दए मोमिन के साथ रहता है।)))

49- आपका इरषादे गिरामी (जिसमें परवरदिगार के मुख़्तलिफ़ सिफ़ात और उसके इल्म का तज़किरा किया गया है)

सारी तारीफ़ें उस ख़ुदा के लिये हैं जो मख़फ़ी उमूर की गहराइयों से बाख़बर है और उसके वजूद की रहनुमाई ज़हूर की तमाम निषानियां कर रही हैं। वह देखने वालों की निगाह में आने वाला नहीं है लेकिन न किसी न देखने वाले की आँख उसका इन्कार कर सकती है और न किसी असबात करने वाले का दिल इसकी हक़ीक़त को देख सकता है। वह बुलन्दियों में इतना आगे है के कोई शै उससे बुलन्दतर नहीं है और क़ुरबत में इतना क़रीब है के कोई शय इससे क़रीबतर नहीं है। न इसकी बलन्दी उसे मख़लूक़ात से दूर बना सकती है और न इसकी क़ुरबत बराबर की जगह पर ला सकती है। इसने अक़लों को अपनी सिफ़तों की हुदूद से बाख़बर नहीं किया है और बक़द्रे वाजिब मारेफ़त से महरूम भी नहीं रखा है। वह ऐसी हस्ती है के इसके इनकार करने वाले के दिल पर इसके वजूद की निषानियां शहादत दे रही हैं। वह मख़लूक़ात से तषबीह देने वाले और इन्कार करने वाले दोनों की बातों से बलन्द व बालातर है।

50- आपका इरषादे गिरामी (इसमें उन फ़ित्नों का तज़केरा है जो लोगों को तबाह कर देते हैं और इनके असरात का भी तज़किरा है)

फ़ित्नों की इब्तेदा इन ख़्वाहिषात से होती है जिनका इत्तेबाअ किया जाता है और इन जदीदतरीन एहकाम से होती है जो गढ़ लिये जाते हैं और सरासर किताबे ख़ुदा के खि़लाफ़ होते हैं। इसमें कुछ लोग दूसरे लागों के साथ हो जाते हैं और दीने ख़ुदा से अलग हो जाते हैं के अगर बातिल हक़ की आमेज़िष से अलग रहता तो हक़ के तलबगारों पर मख़फ़ी न हो सकता और अगर हक़ बातिल की मिलावट से अलग रहता तो दुष्मनों की ज़बानें न खुल सकती। लेकिन एक हिस्सा इसमें से लिया जाता है और एक हिस्सा उसमें से, और फिर दोनों को मिला दिया जाता है और ऐसे ही मवाक़े पर शैतान अपने साथियों पर मुसल्लत हो जाता है और सिर्फ़ वह लोग निजात हासिल कर पाते हैं जिनके लिये परवरदिगार की तरफ़ से नेकी पहले ही पहुँच जाती है।

(((इस इरषादे गिरामी का आग़ाज लफ़्ज़े इन्नमा से हुआ है जो इस बात की दलील है के दुनिया का हर फ़ितना ख़्वाहिषात की पैरवी और बिदअतों की ईजाद से शुरू होता है और यही तारीख़ी हक़ीक़त है के अगर उम्मते इस्लामिया ने रोज़े अव्वल किताबे ख़ुदा के खि़लाफ़ मीरास के एहकाम वाज़े न किये होते और अगर मन्सब व इक़्तेदार की ख़्वाहिष में ‘‘मन कुन्तो मौला’’ का इन्कार न किया होता और कुछ लोग कुछ लोगों के हमदर्द न हो गए होते और नस्ल पैग़म्बर (स0) के साथ सिन व साल और सहाबियत व क़राबत के झगड़े न शामिल कर दिये होते तो आज इस्लाम बिल्कुल ख़ालिस और सरीह होता और उम्मत में किसी तरह का फ़ित्ना व फ़साद न होता। लेकिन अफ़सोस के यह सब कुछ हो गया और उम्मत एक दायमी फ़ित्ने में मुब्तिला हो गई जिसका सिलसिला चैदह सदियों से जारी है और ख़ुदा जाने कब तक जारी रहेगा।)))

51- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जब माविया के साथियों ने आपके साथियों को हटाकर सिफ़फ़ीन के क़रीब फ़ुरात पर ग़लबा हासिल कर लिया और पानी बन्द कर दिया)

देखो दुष्मनों ने तुमसे ग़िज़ाए जंग का मुतालबा कर दिया है अब या तो तुम ज़िल्लत और अपने मुक़ाम की पस्ती पर क़ायम रह जाओ या अपनी तलवारों को ख़ून से सेराब कर दो और ख़ुद पानी से सेराब हो जाओ। दर हक़ीक़त मौत ज़िल्लत की ज़िन्दगी में हैं और ज़िन्दगी इज़्ज़त की मौत में है। आगाह हो जाओ के माविया गुमराहों की एक जमाअत की क़यादत कर रहा है जिस पर तमाम हक़ाएक़ पोषीदा हैं और उन्होंने जेहालत की बिना पर अपनी गरदनों को तीरे अजल का निषाना बना दिया है।

52- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जिसमें दुनिया में ज़ोहद की तरग़ीब और पेष परवरदिगार इसके सवाब और मख़लूक़ात पर ख़ालिक़ की नेमतों का तज़किरा किया गया है।)

अगाह हो जाओ दुनिया जा रही है और इसने अपनी रूख़सत का एलान कर दिया है और इसकी जानी पहचानी चीज़ें भी अजनबी हो गई हैं। वह तेज़ी से मुंह फेर रही है और अपने बाषिन्दों को फ़ना की तरफ़ ले जा रही है और अपने हमाइयों को मौत की तरफ़ ढकेल रही है। इसकी शीरीं तल्ख़ हो चुकी है और इसकी सफ़ाई मकद्दर हो चुकी है। अब इसमें सिर्फ़ इतना ही पानी बाक़ी रह गया है जो तह में बचा हुआ है और वह नपा तुला घूंट रह गया है जिसे प्यासा पी भी ले तो उसकी प्यास नहीं बुझ सकती है। लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा अब इस दुनिया से कूच करने का इरादा कर लो जिसके रहने वालों का मुक़द्दर ज़वाल है और ख़बरदार! त्ुम पर ख़्वाहिषात ग़ालिब न आने पायें और इस मुख़्तसर मुद्दत को तवील न समझ लेना। 

ख़ुदा की क़सम अगर तुम इन ऊंटनियों की तरह भी फ़रयाद करो जिनका बच्चा गुम हो गया हो और उन कबूतरों की तरह नाला-ओ-फ़ुग़ाँ करो जो अपने झुण्ड से अलग हो गए होँ और उन राहिबों की तरह भी गिरया व फ़रयाद करो जो अपने घरबार को छोड़ चुके हों और माल व औलाद को छोड़ कर क़ुरबते ख़ुदा की तलाष में निकल पड़ो ताके इसकी बारगाह में दरजात बलन्द हो जाएं या वह गुनाह माफ़ हो जाएं जो इसके दफ़्तर में सब्त हो गए हैं और फ़रिष्तों ने उन्हें महफ़ूज़ कर लिया है तो भी यह सब इस सवाब से कम होगा जिसकी मैं तुम्हारे बारे में उम्मीद रखता हूँ या जिस अज़ाब का तुम्हारे बारे में ख़ौफ़ रखता हूँ। 
ख़ुदा की क़सम अगर तुम्हारे दिल बिल्कुल पिघल जाएं और तुम्हारी आँखों से आंसुओं के बजाए रग़बते सवाब या ख़ौफ़े अज़ाब में ख़ून जारी हो जाए और तुम्हें दुनिया में आखि़र तक बाक़ी रहने का मौक़ा दे दिया जाए तो भी तुम्हारे आमाल इसकी अज़ीमतरीन नेमतों और हिदायते ईमान का बदला नहीं हो सकते हैँ चाहे इनकी राह में तुम कोई कसर उठाकर न रखो।

(((खुली हुई बात है के ‘‘फ़िक्र हरकस बक़द्रे रहमत ओस्त’’ दुनिया का इन्सान कितना ही बलन्द नज़र और आली हिकमत क्यों न हो जाए मौलाए कायनात (अ0) की बलन्दीए फ़िक्र को नहीं पा सकता है और इस दरजए इल्म पर फ़ाएज़ नहीं हो सकता है जिस पर मालिके कायनात ने बाबे मदीनतुल इल्म को फ़ाएज़ किया है। आप फ़रमाना चाहते हैं के तुम लोग मेरी इताअत करो और मेरे एहकाम पर अमल करो इसका अज्र व सवाब तुम्हारे उफ़्कार की रसाई की हुदूद से बालातर है। मैं तुम्हारे लिये बेहतरीन सवाब की उम्मीद रखता हूँ और तुम्हें बदतरीन अज़ाब से बचाना चाहता हूँ लेकिन इस राह में मेरे एहकाम की इताअत करना होगी और मेरे रास्ते पर चलना होगा जो दर हक़ीक़त शहादत और क़ुरबानी का रास्ता है और इन्सान इसी रास्ते पर क़दम आगे बढ़ाने से घबराता है और हैरत अंगेज़ बात यह है के एक दुनियादार इन्सान जिसकी सारी फ़िक्र माल व दुनिया और सरवते दुनिया है वह भी किसी हलाकत के ख़तरे में मुब्तिला हो जाता है तो अपने को हलाकत से बचाने के लिये सारा माल व मताअ क़ुरबान कर देता है तो फिर आखि़र दुनियादार इन्सान में यह जज़्बा क्यों नहीं पाया जाता है? वह जन्नतुल नईम को हासिल करने और अज़ाबे जहन्नम से बचने के लिये अपनी दुनिया को क़ुरबान क्यों नहीं करता है? इसका तो अक़ीदा यही है के दुनिया चन्द रोज़ा और फ़ानी है और आख़ेरत अबदी और दायमी है तो फ़िर फ़ानी को बाक़ी की राह में क्यों क़ुरबान नहीं कर देता है? ‘‘अन हाज़ल शैअ अजाब’’)))

53- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें रोज़े ईदुल अज़हा का तज़केरा है और क़ुरबानी के सिफ़ात का ज़िक्र किया गया है)

क़ुरबानी के जानवर का कमाल यह है के इसके कान बलन्द हों और आँखें सलामत हों के अगर कान और आँख सलामत हैं तो गोया क़ुरबानी सालिम और मुकम्मल है चाहे इसकी सींग टूटी हुई हो और वह पैरों को घसीट कर अपने को क़ुरबान गाह तक ले जाए।

सय्यद रज़ी- इस मक़ाम पर मन्सक से मुराद मज़नअ और क़ुरबानगाह है।

54- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें आपने अपनी बैयत का तज़किरा किया है)

लोग मुझ पर यूँ टूट पड़े जैसे वह प्यासे ऊँट पानी पर टूट पड़ते हैं जिनके निगरानों ने उन्हें आज़ाद छोड़ दिया हो और उनके पैरों की रस्सियां खोल दी हों यहां तक के मुझे यह एहसास पैदा हो गया के यह मुझे मार ही डालेंगे या एक दूसरे को क़त्ल कर देंगे। मैंने इस अम्रे मुख़ालफ़त को यूँ उलट पलट कर देखा है के मेरी नीन्द तक उड़ गई है और अब यह महसूस किया है के या इनसे जेहाद करना होगा या पैग़म्बर (स0) के एहकाम का इन्कार कर देना होगा। ज़ाहिर है के मेरे लिये जंग की सख़्ितयों का बरदाष्त करना अज़ाब की सख़्ती बरदाष्त करने से आसानतर है और दुनिया की मौत आख़ेरत की मौत और तबाही से सुबुकतर है।

(((सवाल यह पैदा होता है के जिस इस्लाम में रोज़े अव्वल से बज़ोरे शमषीर बैअत ली जा रही थी और इन्कारे बैअत करने पर घरों में आगणन लगाई जा रही थी या लोगों को ख़न्जर व शमषीर और ताज़ियाना व दुर्रा का निषाना बनाया जा रहा था। इसमें यकबारगी यह इन्क़ेलाब कैसे आ गया के लोग एक इन्सान की बैअत करने के लिये टूट पड़े और यह महसूस होने लगा के जैसे एक दूसरे को क़त्ल कर देंगे। क्या इसका राज़ यह था के लोग इस एक शख़्स के इल्म व फ़ज़्ल, ज़ोहद व तक़वा और शुजाअत व करम से मुतास्सिर हो गए थे। ऐसा होता तो यह सूरते हाल बहुत पहले पैदा हो जाती और लोग इस शख़्स पर क़ुरबान हो जाते। हालांके ऐसा नहीं हो सका जिसका मतलब यह है के क़ौम ने शख़्िसयत से ज़्यादा हालात को समझ लिया था और यह अन्दाज़ा कर लिया था के वह शख़्स जो उम्मत के दरमियान वाक़ेई इन्साफ़ कर सकता है और जिसकी ज़िन्दगी एक आम इन्सान की ज़िन्दगी की तरह सादगी रखती है और इसमें किसी तरह की हर्स व तमअ का गुज़र नहीं है वह इस मर्दे मोमिन और कुल्ले ईमान के अलावा कोई दूसरा नहीं है। लेहाज़ा इसकी बैयत में सबक़त करना एक इन्सानी और ईमानी फ़रीज़ा है और दरहक़ीक़त मौलाए कायनात (अ0) ने इस पूरी सूरते हाल को एक लफ़्ज़ में वाज़ेअ कर दिया है के यह दिन दर हक़ीक़त प्यासों के सेराब होने का दिन था और लोग मुद्दतों से तष्नाकाम थे लेहाज़ा इनका टूट पड़ना हक़ बजानिब था। इस एक तषबीह से माज़ी और हाल दोनों का मुकम्मल अन्दाज़ा किया जा सकता है।)))

55-आपका इरषादे गिरामी  (जब आपके असहाब ने यह इज़हार किया के अहले सिफ़फ़ीन से जेहाद की इजाज़त में ताख़ीर से काम ले रहे हैं)

तुम्हारा सवाल के क्या यह ताख़ीर मौत की नागवारी से है तो ख़ुदा की क़सम मुझे मौत की कोई परवाह नहीं है के मैं इसके पास वारिद हो जाऊँ या वह मेरी तरफ़ निकलकर आ जाए। और तुम्हारा यह ख़याल के मुझे अहले शाम के बातिल के बारे में कोई शक है, तो ख़ुदा गवाह है के मैंने एक दिन भी जंग को नहीं टाला है मगर इस ख़याल से के शायद कोई गिरोह मुझ से मुलहक़ हो जाए और हिदायत पा जाए और मेरी रौषनी में अपनी कमज़ोर आंखों का इलाज कर ले के यह बात मेरे नज़दीक उससे कहीं ज़्यादा बेहतर है के मैं उसकी गुमराही की बिना पर उसे क़त्ल कर दूँ अगरचे इस क़त्ल का गुनाह उसी के ज़िम्मे होगा।

56- आपका इरषादे गिरामी

(जिसमें असहाबे रसूल (स0) को याद किया गया है उस वक़्त जब सिफ़फ़ीन के मौक़े पर आपने लोगों को सुल का हुक्म दिया था)

हम रसूले अकरम (स0) के साथ अपने ख़ानदान के बुज़ुर्ग, बच्चे, भाई बन्द और चचाओं को भी क़त्ल कर दिया करते थे और इससे हमारे ईमान और जज़्बए तसलीम में इज़ाफ़ा ही होता था और हम बराबर सीधे रास्ते पर बढ़ते ही जा रहे थे और मुसीबतों की सख़्ितयों पर सब्र ही करते जा रहे थे और दुष्मन से जेहाद में कोषिषें ही करते जा रहे थे। हमारा सिपाही दुष्मन के सिपाही से इस तरह मुक़ाबला करता था जिस तरह मर्दों का मुक़ाबला होता है के एक दूसरे की जान के दरपै हो जाएं और हर एक को यही फ़िक्र हो के दूसरे को मौत का जाम पिला दें। फिर कभी हम दुष्मन को मार लेते थे और कभी दुष्मन को हम पर ग़लबा हो जाता था। इसके बाद जब ख़ुदा ने हमारी सिदाक़त को आज़मा लिया तो हमारे दुष्मन पर ज़िल्लत नाज़िल कर दी और हमारे ऊपर नुसरत का नुज़ूल फ़रमा दिया यहाँतक के इस्लाम सीना टेक कर अपनी जगह जम गया और अपनी मन्ज़िल पर क़ायम हो गया। 

मेरी जान की क़सम अगर हमारा किरदार भी तुम्हीं जैसा होता तो न दीन का कोई सुतून क़ायम होता और न ईमान की कोई शाख़ हरी होती। ख़ुदा की क़सम तुम अपने करतूतों से दूध के बदले ख़ून दुहोगे और आखि़र में पछताओगे।

(((हज़रत मोहम्मद बिन अबीबक्र की शहादत के बाद माविया ने अब्दुल्लाह बिन आमिर हिज़्री को बसरा में दोबारा फ़साद फ़ैलाने के लिये भेज दिया। वहां हज़रत के वाली इब्ने अब्बास थे और वह मोहम्मद की ताज़ियत के लिये कूफ़े आ गये थे। ज़ियाद बिन अबीदान के नाएब थे। इन्होंने हज़रत को इत्तेलात दी, आपने बसरा के बनी तमीम मा उस्मानी रूझान देखकर कूफ़े के बनी तमीम को मुक़ाबले पर भेजना चाहा लेकिन इन लोगों ने बिरादरी से जंग करने से इन्कार कर दिया तो हज़रत ने अपने दौरे क़दीम का हवाला दिया के अगर रसूले अकरम (स0) के साथ हम लोग भी क़बायली ताअस्सुब का षिकार हो गए होते तो आज इस्लाम का नामो निषान भी न होता, इस्लाम हक़ व सिदाक़त का मज़हब है इसमें क़ौमी और क़बायली रूझानात की कोई गुन्जाइष नहीं है।
यह एक अज़ीम हक़ीक़त का एलान है के परवरदिगार अपने बन्दों की बहरहाल मदद करता है। उसने साफ़ कह दिया के ‘‘कान हक़्क़ा अलैना नसरूल मोमेनीन’’ (मोमेनीन की मदद हमारी ज़िम्मेदारी है) ‘‘इन्नल्लाहा मअस्साबेरीन’’ (अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है) लेकिन इस सिलसिले में इस हक़ीक़त को बहरहाल समझ लेना चाहिये के यह नुसरत ईमान के इज़हार के बाद और यह मायते सब्र के बाद सामने आती है। जब तक इन्सान अपने ईमान व सब्र का सूबूत नहीं दे देता है, ख़ुदाई इमदाद का नुज़ूल नहीं होता है। ‘‘अन तनसरूल्लाह यनसुरकुम’’ (अगर तुम अल्लाह की मदद करोगे तो अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा) नुसरते इलाही तोहफ़ा नहीं है मुजाहेदात का इनआम है, पहले मुजाहिदे नफ़्स, इसके बाद इनआम।)))

57- आपका इरषादे गिरामी (एक क़ाबिले मज़म्मत शख़्स के बारे में)

आगाह हो जाओ के अनक़रीब तुम पर एक शख़्स मुसल्लत होगा जिसका हलक़ कुषादा और पेट बड़ा होगा। जो पा जाएगा खा जाएगा और जो न पाएगा उसकी जुस्तजू में रहेगा। तुम्हारी ज़िम्मेदारी होगी के उसे क़त्ल कर दो मगर तुम हरगिज़ क़त्ल न करोगे। ख़ैर, वह अनक़रीब तुम्हें, मुझे गालियाँ देने और मुझसे बेज़ारी करने का भी हुक्म देगा। तो अगर गालियों की बात हो तो मुझे बुरा भला कह लेना के यह मेरे लिये पाकीज़गी का सामान है और तुम्हारे लिये दुष्मन से निजात का, लेकिन ख़बरदार मुझसे बराएत न करना के मैं फ़ितरते इस्लाम पर पैदा हूआ हूँ और मैंने ईमान और हिजरत दोनों में सबक़त की है।

58- आपका इरषादे गिरामी
(जिसका मुख़ातिब उन ख़वारिज को बनाया गया है जो तहकीम से किनाराकष हो गए और ‘‘ला हुक्म इलल्लाह’’ का नारा लगाने लगे)

ख़ुदा करे तुम पर सख़्त आन्धियाँ आएं और कोई तुम्हारे हाल का इस्लाह करने वाला न रह जाए। क्या मैं परवरदिगार पर ईमान लाने और रसूले अकरम (स0) के साथ जेहाद करने के बाद अपने बारे में कुफ्ऱ का ऐलान कर दूँ। ऐसा करूंगा तो मैं गुमराह हो जाऊँगा और हिदायत याफ़ता लोगों में न रह जाउंगा। जाओ पलट जाओ अपनी बदतरीन मंज़िल की तरफ़ और वापस चले जाओ अपने निषानाते क़दम पर। मगर आगाह रहो के मेरे बाद तुम्हें हमागीर ज़िल्लत और काटने वाली तलवार का सामना करना होगा और इस तरीक़ए कार का मुक़ाबला करना होगा जिसे ज़ालिम तुम्हारे बारे में अपने सुन्नत बना लेँ यानी हर चीज़ को अपने लिये मख़सूस कर लेना।

सय्यद रज़ी- हज़रत का इरषाद ‘‘ला बक़ी मिनकुम आबरुन’’ तीन तरीक़ों से नक़्ल किया गया है- आबरुन- वह शख़्स जो दरख़्ते ख़ुरमा को कांट छाट कर उसकी इसलाह करता है। आसरुन- रिवायत करने वाला यानी तुम्हारी ख़बर देने वाला कोई न रह जाएगा और यही ज़्यादा मुनासिब मालूम होता है।
आबज़ुन- कूदने वाला या हलाक होने वाला के मज़ीद हलाकत के लिये भी कोई न रह जाएगा।

59- आपका इरषादे गिरामी (आपने उस वक़्त इरषाद फ़रमाया जब आपने ख़वारिज से जंग का अज़्म कर लिया और नहरवान के पुल को पार कर लिया)

याद रखो! दुष्मनों की क़त्लगाह दरिया के उस तरफ़ है। ख़ुदा की क़सम न उनमें से दस बाक़ी बचेंगे और न तुम्हारे दस हलाक हो सकेंगे।
सय्यद रज़ी - नुत्फ़े से मुराद नहर का शफ़ाफ़ पानी है जो बेहतरीन कनाया है पानी के बारे में चाहे इसकी मिक़दार कितनी ही ज़्यादा क्यों न हो।

(((जब अमीरूल मोमेनीन (अ0) को यह ख़बर दी गई के ख़वारिज ने सारे मुल्क में फ़साद फ़ैलाना शुरू कर दिया है, जनाबे अब्दुल्लाह बिन ख़बाब बिन इलारत को उनके घर की औरतों समेत क़त्ल कर दिया है और लोगों में मुसलसल दहषत फ़ैला रहे हैं तो आपने एक शख़्स को समझाने के लिये भेजा, इन ज़ालिमों ने उसे भी क़त्ल कर दिया। इसके बाद जब हज़रत अब्दुल्लाह बिन ख़बाब के क़ातिलों को हवाले करने का मुतालबा किया तो साफ़ कह दिया के हम सब क़ातिल हैं। इसके बाद हज़रत ने बनफ़्से नफ़ीस तौबा की दावत दी लेकिन उन लोगों ने उसे भी ठुकरा दिया। आखि़र एक दिन वह आ गया जब लोग एक लाष को लेकर आए और सवाल किया के सरकार अब फ़रमाएं अब क्या हुक्म है? तो आपने नारा-ए-तकबीर बलन्द करके जेहाद का हुक्म दे दिया और परवरदिगार के दिये हुए इल्मे ग़ैब की बिना पर अन्जामकार से भी बाख़बर कर दिया जो बक़ौल इब्नुल हदीद सद-फ़ीसद सही साबित हुआ और ख़वारिज के सिर्फ़ नौ अफ़राद बचे और हज़रत (अ0) के साथियों में सिर्र्फ़ आठ अफ़राद शहीद हुए।)))

60- आपने फ़रमाया (उस वक़्त जब ख़वारिज के क़त्ल के बाद लोगों ने कहा के अब तो क़ौम का ख़ात्मा हो चुका है)

हरगिज़ नहीं- ख़ुदा गवाह है के यह अभी मुरदों के सल्ब और औरतों के रह़म में मौजूद हैं और जब भी इनमें कोई सर निकालेगा उसे सर काट दिया जाएगा, यहाँ तक के आखि़र में सिर्फ़ लुटेरे और चोर होकर रह जाएंगे।

61- आपने फ़रमाया

ख़बरदार मेरे बाद ख़ुरूज करने वालों से जंग न करना के हक़ की तलब में निकलकर बहक जाने वाला उसका जैसा नहीं होता है जो बातिल की तलाष में निकले और हासिल भी कर ले।

सय्यद रज़ी- आखि़री जुमले से मुराद माविया और इसके असहाब हैं।

62- आपका इरषाद गिरामी (जब आपको अचानक क़त्ल से डराया गया)

याद रखो मेरे लिये ख़ुदा की तरफ़ से एक मज़बूत व मुस्तहकम सिपर है। इसके बाद जब मेरा दिन आ जाएगा तो यह सिपर मुझसे अलग हो जाएगी और मुझे मौत के हवाले कर देगी। उस वक़्त न तीर ख़ता करेगा और न ज़ख़्म मुन्दमिल हो सकेगा।

63- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें दुनिया के फ़ित्नों से डराया गया है)

आगाह हो जाओ के यह दुनिया ऐसा घर है जिससे सलामती का सामान इसी के अन्दर से किया जा सकता है और कोई ऐसी शय वसीलए निजात नहीं हो सकती है जो दुनिया ही के लिये हो। लोग इस दुनिया के ज़रिये आज़माए जाते हैं। जो लोग दुनिया का सामान दुनिया ही के लिये हासिल करते हैं वह इसे छोड़कर चले जाते हैं और फिर हिसाब भी देना होता है और जो लोग यहाँ से वहाँ के लिये हासिल करते हैं वह वहाँ जाकर पा लेते हैं और इसी में मुक़ीम हो जाते हैं। यह दुनिया दरहक़ीक़त साहेबाने अक़्ल की नज़र में एक साया जैसी है जो देखते देखते सिमट जाता है और फैलते फैलते कम हो जाता है। 
 (((इन्सान के क़दम मौत की तरफ़ बिला इख़्तेयार बढ़ते जा रहे हैं और उसे इस अम्र का एहसास भी नहीं होता है। नतीजा यह होता है के एक दिन मौत के मुँह में चला जाता है और दाएमी ख़सारा और अज़ाब में मुब्तिला हो जाता है लेहाज़ा तक़ाज़ाए अक़्ल व दानिष यही है के आमाल को साथ लेकर आगे बढ़ेगा ताके जब मौत का सामना हो तो आमाल का सहारा रहे और अज़ाबे अलीम से निजात हासिल करने का वसीला हाथ में रहे। )))

64- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (नेक आमाल की तरफ़ सबक़त के बारे में)

बन्दगाने ख़ुदा अल्लाह से डरो और आमाल के साथ अजल की तरफ़ सबक़त करो। इस दुनिया के फ़ानी माल के ज़रिये बाक़ी रहने वाली आख़ेरत को ख़रीद लो और यहाँ से कूच कर जाओ के तुम्हें तेज़ी से ले जाया जा रहा है और मौत के लिये आमादा हो जाओ के वह तुम्हारे सरों पर मण्डला रही है। उस क़ौम जैसे हो जाओ जिसे पुकारा गया तो फ़ौरन होषियार हो गई। और उसने जान लिया के दुनिया इसकी मन्ज़िल नहीं है तो उसे आखि़रत से बदल लिया। इसलिये के परवरदिगार ने तुम्हें बेकार नहीं पैदा किया है और न महमिल छोड़ दिया है और याद रखो के तुम्हारे और जन्नत व जहन्नम के दरमियान इतना ही वक़्फ़ा है के मौत नाज़िल हो जाए और अन्जाम सामने आ जाए और वह मुद्दते हयात जिसे हर लम्हज़ कम कर रहा हो और हर साअत इसकी इमारत को मुनहदिम कर रही हो वह क़सीरूल मुद्दत ही समझने के लाएक़ है और वह मौत जिसे दिन व रात ढकेल कर आगे ला रहे हों उसे बहुत जल्द आने वाला ही ख़याल करना चाहिये और वह शख़्स जिसके सामने कामयाबी या नाकामी और बदबख़्ती आने वाली है उसे बेहतरीन सामान मुहैया ही करना चाहिये। लेहाज़ा दुनिया में रहकर दुनिया से ज़ादे राह हासिल कर लो जिससे कल अपने नफ़्स का तहफ़्फ़ुज़ कर सको। इसका रास्ता यह है के बन्दा अपने परवरदिगार से डरे। अपने नफ़्स से इख़लास रखे, तौबा की मक़दम करे, ख़्वाहिषात पर ग़लबा हासिल करे इसलिये के इसकी अजल इससे पोषीदा है और इसकी ख़्वाहिष इसे मुसलसल धोका देने वाली है और शैतान इसके सर पर सवार है जो मासियतों को आरास्ता कर रहा है ताके इन्सान मुरतकब हो जाए और वौबा की उम्मीदें दिलाता है ताके इसमें ताख़ीर करे यहाँ तक के ख़फ़लत और बे ख़बरी के आलम में मौत इस पर हमलावर हो जाती है। हाए किस क़दर हसरत का मक़ाम है के इन्सान की अम्र ही इसके खि़लाफ़ हुज्जत बन जाए और इसका रोज़गार ही इसे बदबख़्ती तक पहुंचा दे। परवरदिगार से दुआ है के हमें और तुम्हें उन लोगों में क़रार दे जिन्हें नेमतें मग़रूर नहीं बनाती हैं और कोई मक़सद इताअते ख़ुदा में कोताही पर आमादा नहीं करता है और मौत के बाद इन पर निदामत और रंज व ग़म का नुज़ूल नहीं होता है।

65- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें इल्मे इलाही के लतीफ़तरीन मुबाहिस की तरफ़ इषारा किया गया है)

तमाम तारीफ़ें उस ख़ुदा के लिये हैं जिसके सिफ़ात में तक़दम व ताख़र नहीं होता है के वह आखि़र होने से पहले और अव्वल रहा हो और बातिन बनने से पहले ज़ाहिर रहा हो। उसके अलावा जिसे भी वाहिद कहा जाता है उसकी वहदत क़िल्लत है और जिसे भी अज़ीज़ समझा जाता है उसकी इज़्ज़त ज़िल्लत है। इसके सामने हर क़ौमी ज़ईफ़ है और हर मालिक ममलूक है, हर आलिम मुतअल्लिम है और हर क़ादिर आजिज़ है, हर सुनने वाला लतीफ़ आवाज़ों के लिये बहरा है और ऊंची आवाज़ें भी इसे बहरा बना देती हैं और दूर की आवाज़ें भी इसकी हद से बाहर निकल जाती हैं और इसी तरह इसके अलावा हर देखने वाला मख़फ़ी रंग और हर लतीफ़ जिस्म को नहीं देख सकता है। इसके अलावा हर ज़ाहिर ग़ैरे बातिन है और हर बातिन ग़ैरे ज़ाहिर है इसने मख़लूक़ात को अपनी हुकूमत के इस्तेहकाम या ज़माने के नताएज के ख़ौफ़ से नहीं पैदा किया है।  न उसे किसी बराबर वाले ख़मलावर या साहबे कसरत शरीक या टकराने वाले मद्दे मुक़ाबिल के मुक़ाबले में मदद लेना थी। यह सारी मख़लूक़ उसी की पैदा की हुई है और पाली हुई है और यह सारे बन्दे उसी के सामने सरे तस्लीम ख़म किये हुए हैं। उसने अश्याअ में हुलूल नहीं किया है के उसे किसी के अन्दर समाया हुआ कहा जाए और न इतना दूर हो गया है के अलग थलग ख़्याल किया जाए। मख़लूक़ात की खि़लक़त और मसनूआत की तदबीर उसे थका नहीं सकती है और न कोई तख़लीक़ उसे आजिज़ बना सकती है और न किसी क़ज़ा व क़द्र में उसे कोई शुबह पैदा हो सकता है।  उसका हर फ़ैसला मोहकम और इसका हर इल्म मुतअत्तन और इसका हर हुक्म मुस्तहकम है। नाराज़गी में भी उससे उम्मीद वाबस्ता की जाती है और नेमतों में भी इसका ख़ौफ़ लाहक़ रहता है।

(((यह उस नुक्ते की तरफ़ इषारा है के परवरदिगार के सिफ़ाते कमाल ऐन ज़ात हैं और ज़ात से अलग कोई शै नहीं हैं। वह इल्म की वजह से आलिम नहीं है बल्कि ऐने हक़ीक़ते इल्म है और क़ुदरत के ज़रिये क़ादिर नहीं है बल्के ऐने क़ुदरते कामेला है और जब यह सारे सिफ़ात ऐने ज़ात हैं तो इनमें तक़दम व ताख़र का कोई सवाल ही नहीं है वह जैसे लख़्तए अव्वल है उसी तरह लख़्तए आखि़र भी है और जिस अन्दाज़ से ज़ाहिर है उसी अन्दाज़ से बातिन भी है। इसकी ज़ाते अक़दस में किसी तरह का तख़ीर क़ाबिले तसव्वुर नहीं है। हद यह है के उसकी समाअत व बसारत भी मख़लूक़ात की समाअत व बसारत से बिलकुल अलग है। दुनिया का हर समीअ व बसीर किसी शै को देखता और सुनता है और किसी शै के देखने और सुनने से क़ासिर रहता है लेकिन परवरदिगार की ज़ाते अक़दस ऐसी नहीं है वह मख़फ़ी तरीन मनाज़िर को देख रहा है और लतीफ़तरीन आवाज़ों को सुन रहा है। वह ऐसा ज़ाहिर है जो बातिन नहीं है और ऐसा बातिन है जो किसी अक़्ल व फ़हम पर ज़ाहिर नहीं हो सकता।)))

66-आपका इरषादे गिरामी (तालीमे जंग के बारे में)

 मुसलमानों! ख़ौफ़े ख़ुदा को अपना शआर बनाओ, सुकून व वेक़ार की चादर ओढ़ लो, दाँतों को भींच लो के इससे तलवारें सरों से उचट जाती है, ज़िरह पोषी को मुकम्मल कर लो, तलवारों को न्याम से निकालने से पहले न्याम के अन्दर हरकत दे लो। दुष्मन को तिरछी नज़र से देखते रहो और नैज़ों से दोनों तरफ़ वार करते रहो। उसे अपनी तलवारों की बाढ़ पर रखो और तलवारों के हमले क़दम आगे बढ़ाकर करो और यह याद रखो के तुम परवरदिगार की निगाह में और रसूले अकरम (स0) के इब्न अम के साथ हो। दुष्मन पर मुसलसल हमले करते रहो और फ़रार से शर्म करो के इसका आर नस्लों में रह जाता है और इसका अन्जाम जहन्नम होता है। अपने नफ़्स को हंसी ख़ुषी ख़ुदा के हवाले कर दो और मौत की तरफ़ नेहायत दरजए सुकून व इतमीनान से क़दम आगे बढ़ाओ। तुम्हारा निषाना एक दुष्मन का अज़ीम लष्कर और तनाबदारे ख़ेमा होना चाहिये के इसी के दस्त पर हमला करो के शैतान इसी के एक गोषे में बैठा हुआ है। इसका हाल यह है के इसने एक क़दम हमले के लिये आगे बढ़ा रखा है और एक भागने के लिये पीछे कर रखा है लेहाज़ा तुम मज़बूती से अपने इरादे पर जमे रहो यहाँ तक के हक़ सुबह के उजाले की तरह वाज़ेह हो जाए और मुतमईन रहो के बलन्दी तुम्हारा हिस्सा है और अल्लाह तुम्हारे साथ है और वह तुम्हारे आमाल को ज़ाया नहीं कर सकता है।

 (((इन तालीमात पर संजीदगी से ग़ौर किया जाए तो अन्दाज़ा होगा के एक मर्दे मुस्लिम के जेहाद का अन्दाज़ क्या होना चाहिये और उसे दुष्मन के मुक़ाबले में किस तरह जंग आज़मा होना चाहिये, इन तालीमात का मुख़्तसर ख़ुलासा यह है- 1. दिल के अन्दर ख़ौफ़े ख़ुदा हो। 2. बाहर सुकून व इत्मीनान का मुज़ाहिरा हो। 3. दाँतों को भींच लिया जाए। 4. आलाते जंग को मुकम्मल तौर पर साथ रखा जाए। 5. तलवार को न्याम के अन्दर हरकत दे ली जाए के बरवक़्त निकालने में ज़हमत न हो। 6- दुष्मन पर ग़ैत आलूद निगाह की जाए, 7- नेज़ों के हमले हर तरफ़ हों। 8- तलवार दुष्मन के सामने रहे। 9- तलवार दुष्मन तक न पहुँचे तो क़दम बढ़ाकर हमला करे। 10- फ़रार का इरादा न करे। 11- मौत की तरफ़ सुकून के साथ क़दम बढ़ाए। 12- जान जाने आफ़रीं के हवाले कर दे। 13- हदफ़ और निषाने पर निगाह रखे। 14- यह इत्मीनान रखे के ख़ुदा हमारे आमाल को देख रहा है और पैग़म्बर (स0) का भाई हमारी निगाह के सामने है। ज़्ाहिर है के इन आदाब में बाज़ आदाब, तक़वा, ईमान, इत्मीनान वग़ैरा दाएमी हैसियत रखते हैं और बाज़ का ताल्लुक़ नेज़ा व शमषीर के दौर से है लेकिन इसे भी हर दौर के आलाते हर्ब व ज़र्ब पर मुन्तबिक़ किया जा सकता है और उससे फ़ायदा उठाया जा सकता है।)))

67- आपका इरषादे गिरामी

(जब रसूले अकरम (स0) के बाद सक़ीफ़ा बनी सादह की ख़बरें पहुँचीं और आपने पूछा के अन्सार ने क्या एहतेजाज किया तो लोगों ने बताया के वह यह कह रहे थे के एक अमीर हमारा होगा और एक तुम्हारा- तो आपने फ़रमाया)

तुम लोगों ने उनके खि़लाफ़ यह इस्तेदलाल क्यों नहीं किया के रसूले अकरम (स0) ने तुम्हारे नेक किरदारों के साथ हुस्ने सुलूक और ख़ताकारों से दरगुज़र करने की वसीयत फ़रमाई है? लोगों ने कहा के इसमें क्या इस्तेदलाल है? फ़रमाया के अगर इमामत व इमारत इनका हिस्सा होती तो इनसे वसीयत की जाती न के इनके बारे में वसीयत की जाती। इसके बाद आपने सवाल किया के क़ुरैष की दलील क्या थी? लोगों ने कहा के वह अपने को रसूले अकरम (स0) के शजरे में साबित कर रहे थे। फ़रमाया के अफ़सोस शजरे से इस्तेदलाल किया और समरह को ज़ाया कर दिया।