True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

157- आपका इरषादे गिरामी

तमाम हम्द उस ख़ुदा के लिये है जिसने हम्द को अपने ज़िक्र का इफ़तेताहिया, अपने फ़ज़्ल व एहसान के बढ़ाने का ज़रिया और अपनी नेमतों और अज़मतों का दलीले राह क़रार दिया है।

ऐ अल्लाह के बन्दों! बाक़ी मान्दा लोगों के साथ भी ज़माने की वही रौषन रहेगी जो गुज़र जाने वाले के साथ थी। जितना ज़माना गुज़र चुका है वह पलट कर नहीं आएगा और जो कुछ उसमें है वह भी हमेषा रहने वाला नहीं, आखि़र में भी इसकी कारगुज़ारियां वही होंगी जो पहले रह चुकी हैं और इसके झण्डे एक दूसरे के अक़ब में हैं। गोया तुम क़यामत के दामन से वाबस्ता हो के वह तुम्हें धकेलकर इस तरह लिये जा रही है जिस तरह ललकारने वाला अपनी ऊंटनियों को, जो शख़्स अपने नफ़्स को संवारने के बजाए चीज़ों में पड़ जाता है वह तीरगियों में सरगर्दां और हलाकतों में फंसा रहता है और शयातीन उसे सरकषियों में खींच कर ले जाते हैं और उसकी बदआमालियों को उसके सामने सज (सजा) देते हैं आगे बढ़ने वालों की आखि़री मंज़िल जन्नत है और अमदन कोताहियां करने वालों की हद जहन्नम है।

अल्लाह के बन्दों! याद रखो के तक़वा एक मज़बूत क़िला है और फ़िस्क़ व फ़ुजूर एक (कमज़ोर) चारदीवारी है के जो न अपने रहने वालों से तबाहियों को रोक सकती है और न उनकी हिफ़ाज़त कर सकती है। देखो तक़वा ही वह चीज़ है के जिससे गुनाहों का डंक काटा जाता है और यक़ीन ही से मुफ़तबाए मक़सद की कामरानियां हासिल होती हैं। ऐ अल्लाह के बन्दों। अपने नफ़्स के बारे में के जो तुम्हें तमाम नफ़्सों से ज़्यादा अज़ीज़ व महबूब है अल्लाह से डरो! उसने तुम्हारे लिये हक़ का रास्ता खोल दिया है और उसकी राहें उजागर कर दी हैं। अब या तो अनमिट बदबख़्ती होगी या दाएमी ख़ुष बख़्ती व सआदत, दारे फ़ानी से आलिमे बाक़ी के लिये तौषा मुहय्या कर लो, तुम्हें ज़ादे राह का पता दिया जा चुका है और कूच का हुक्म मिल चुका है और चल चलाओ के लिये जल्दी मचाई जा रही है, तुम ठहरे हुए सवारों के मानिन्द हो के तुम्हें यह पता नही ंके कब रवानगी का हुक्म दिया जाएगा, भला वह दुनिया को लेकर क्या करेगा जो आख़ेरत के लिये पैदा किया गया हो, और उस माल का क्या करेगा जो अनक़रीब उससे छिन जाने वाला है और उसका मज़लेमा व हिसाब उसके ज़िम्मे रहने वाला है।

अल्लाह के बन्दों! ख़ुदा ने जिस भलाई का वादा किया है उसे छोड़ा नहीं जा सकता और जिस बुराई से रोका है उसकी ख़्वाहिष नहीं की जा सकती। अल्लाह के बन्दों! उस दिन से डरो के जिसमें हमलों की जांच पड़ताल और ज़लज़लों की बोहतात होगी और बच्चे तक इसमें बूढ़े हो जाएंगे।
अल्लाह के बन्दों! यक़ीन रखो के ख़ुद तुम्हारा ज़मीर तुम्हारा निगेहबान और ख़ुद तुम्हारे आज़ा व जवारेह तुम्हारे निगरान हैं और तुम्हारे हमलों और सांसों की गिनती को सही-सही याद रखने वाले (करामा कातिबैन) हैं उनसे न अन्धेरी रात की अन्धयारियां छिपा सकती हैं और न बन्द दरवाज़े तुम्हें ओझल रख सकते हैं बिला शुबह आने वाला ‘‘कल’’ आज के दिन से क़रीब है।

‘‘आज का दिन’’ अपना सब कुछ लेकर जाएगा और ‘‘कल’’ उसके अक़ब में आया ही चाहता है। गोया तुममें से हर शख़्स ज़मीन के इस हिस्से पर के जहां तन्हाई की मन्ज़िल और गड्ढे का निषान (क़ब्र) है पहुंच चुका है और क़यामत तुम पर छा गई है और आख़ेरी फ़ैसला सुनने के लिये तुम (क़ब्रों से) निकल आए हो बातिल के परदे तुम्हारी आंखों से हटा दिये गये हैं और तुम्हारे हीले बहाने दब चुके हैं और हक़ीकतें तुम्हारे लिये साबित हो गई हैं और तमाम चीज़ें अपने-अपने मक़ाम की तरफ़ पलट पड़ी हैं, इबरतों से पन्द व नसीहत और ज़माने के उलटफेर से इबरत हासिल करो, और डराने वाली चीज़ों से फ़ायदा उठाओ।

158- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें रसूले ख़ुदा की बासत और क़ुरान की फ़ज़ीलत के साथ बनी उमय्या की हुकूमत का ज़िक्र किया गया है)

अल्लाह ने पैग़म्बर को उस वक़्त भेजा जब रसूलों का सिलसिला रूका हुआ था और क़ौमें गहरी नींद में मुब्तिला थीं और दीन की मुस्तहकम रस्सी के बल खुल चुके थे, आपने आकर पहले वालों की तस्दीक़ की और वह नूर पेष किया जिसकी इक़्तेदा की जाए और वह यही क़ुरान है। उसे बुलवाकर देखो और यह ख़ुद नहीं बोलेगा, मैं इसकी तरफ़ से तर्जुमानी करूंगा, याद रखो के इसमें मुस्तक़बिल का इल्म है और माज़ी की दास्तान है। तुम्हारे दर्द की दवा है और तुम्हारे उमूर की तन्ज़ीम का सामान है। (इसका दूसरा हिस्सा) उस वक़्त कोई शहरी या देहाती मकान ऐसा न बचेगा जिसमें ज़ालिम ग़म व अलम को दाखि़ल न कर दें और उसमें सख़्ितयों का गुज़र न हो जाए। उस वक़्त इनके लिये न आसमान में कोई उज़्रख़्वाही करने वाला होगा और न ज़मीन में मददगार, तुमने इस अम्र के लिये नाअहलों का इन्तेख़ाब किया है और उन्हें दूसरे के घाट पर उतार दिया है और अनक़रीब ख़ुदा ज़ालिमों से इन्तेक़ाम लेगा। खाने के बदले में खाने से, पीने के बदले में पीने का यूं के इन्हें खाने के लिये ख़ेज़ाल का खाना और पीने के लिये एलवा का और ज़हर हलाहल का पीना, ख़ौफ़ का अन्दरूनी लिबास और तलवार का बाहर का लिबास होगा, यह ज़ालिम लोगों की सवारियां और गुनाहों के बारे बरादार ऊंट हैं, लेहाज़ा मैं बार-बार क़सम खाकर कहता हूं के बनी उमय्या मेरे बाद इस खि़लाफ़त को इस तरह थूक देंगे, (थूक देना पड़ेगा) जिस तरह बलग़म को थूक दिया जाता है और फिर जब तक शब व रोज बाक़ी हैं इसका मज़ा चखना और उससे लज़्ज़त हासिल करना नसीब न होगा।

(((- मालिके कायनात ने इन्सान की फ़ितरत के अन्दर एक सलाहियत रखी है जिसका काम है नेकियों पर सुकून व इत्मीनान का सामान फ़राहम करना और बुराइयों पर तम्बीह व सरज़न्ष करना, अर्फ़ आम में इसे ज़मीर से ताबीर किया जाता है जो उस वक़्त भी बेदार रहता है जब आदमी ग़फ़लत की नींद सो जाता है और उस वक़्त भी मसरूफ़े तम्बीह रहता है जब इन्सान मुकम्मल तौर पर गुनाहों में डूब जाता है। यह सलाहियत अपने मक़ाम पर हर इन्सान में वदीअत की गई है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है के अच्छाई और बुराई का इदराक भी कभी फ़ितरी होता है जैसे एहसान की अच्छाई और ज़ुल्म की बुराई, और कभी इसका ताल्लुक़ समाज, मुआषरा या दीन व मज़हब से होता है। तो जिस चीज़ को मज़हब या समाज अच्छा कह देता है ज़मीर उससे मुतमईन हो जाता है आर जिस चीज़ को बुरा क़रार दे देता है इस पर मज़म्मत करने लगता है और उस मदह या ज़म का ताअल्लुक़ फ़ितरत के एहकाम से नहीं होता है बल्कि समाज या क़ानून के एहकाम से होता है।-)))

159- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा  (जिसमें रिआया के साथ अपने हुस्ने सुलूक का ज़िक्र फ़रमाया है)

मैं तुम्हारे हमसाये में निहायत दरजए ख़ूबसूरती के साथ रहा और जहां तक मुमकिन हुआ तुम्हारी हिफ़ाज़त और निगेहदाष्त करता रहा और कजी ज़िल्लत की रस्सी और ज़ुल्म के फन्दों से आज़ाद कराया के मैं तुम्हारी मुख़्तसर नेकी का शुक्रिया अदा कर रहा था और तुम्हारी उन तमाम बुराईयों को जिन्हें मैंने देख लिया था उससे चष्म पोषी कर रहा था (जो मेरी आंखों के सामने और मेरी मौजूदगी में होती थीं)।

160- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (अज़मते परवरदिगार)

उसका अम्र फ़ैसलाकुन और सरापा हिकमत है और उसकी रिज़ा मुकम्मल अमान और रहमत है, वह अपने इल्म से फ़ैसला करता है और अपने हिल्म की बिना पर माफ़ कर देता है।   (हम्दे ख़ुदा) परवरदिगार तेरे लिये इन तमाम चीज़ों पर हम्द है जिन्हें तू ले लेता है या अता कर देता है और जिन बलाओं से निजात देता है या जिन में मुब्तिला कर देता है, ऐसी हम्द जो तेरे लिये इन्तेहाई पसन्दीदा हो और महबूबतरीन हो और बेहतरीन हो। (तेरे नज़दीक हर सताइष से बढ़ चढ़ कर हो) ऐसी हम्द जो सारी कायनात को ममलूक कर दे (भर दे) और जो तूने चाहा है उसकी हद तक पहुंच जाए (जहां तक चाहे पहुंच जाए), ऐसी हम्द के जिसके आगे तेरी बारगाह तक पहुंचने से न कोई हिजाब है और न उसके लिये कोई बन्दिष? ऐसी हम्द के जिसकी गिनती न कहीं पर टूटे और न इसका सिलसिला ख़त्म हो, हम तेरी अज़मत व बुज़ुर्गी की हक़ीक़त को नहीं जानते मगर इतना के तू ज़िन्दा व कारसाज़ (आलम) है न तुझे ग़ुनूदगी होती है और न नींद आती है, न तारे नज़र तुझ तक पहुंच सकता है और न निगाहें तुझे देख सकती हैं तूने नज़रों को पा लिया है और उम्रों का अहाता कर लिया है और पेषानी के बालों को पैरों (से मिलाकर) गिरफ़्त में ले लिया है, यह तेरी मख़लूक़ क्या है जो हम देखते हैं और इसमें तेरी क़ुदरत (की कारफ़रमाइयों) पर इसकी तौसीफ़ करते हैं हालांके दर हक़ीक़त वह (मख़लूक़ात) जो हमारी आंखों से ओझल है और जिस तक पहुंचने से हमारी नज़रें आजिज़ और अक़्लें दरमान्दा हैं और हमारे और जिन के दरम्यान ग़ैब के परदे हाएल हैं इससे कहीं ज़्यादा बा अज़मत है जो शख़्स (वसवसों से) अपने दिल को ख़ाली करके और ग़ौर व फ़िक्र (की क़ूवतों) से काम लेकर यह जानना चाहे के तूने क्योंकर अर्ष को क़ायम किया है और किस तरह मख़लूक़ात को पैदा किया है और क्योंकर आसमानों को फ़िज़ा में लटकाया है और किस तरह पानी के थपेड़ों पर ज़मीन को बिछाया है। तो उसकी आंखें थक कर और अक़्ल मग़लूब होकर और कान हैरान व सरासीमा और फ़िक्र गुमगष्ता राह होकर पलट आएगी।

इसी ख़ुत्बे का एक जुज़ यह है वह अपने ख़याल में इसका दावेदार बनता है के उसका दामने उम्मीद अल्लाह से वाबस्ता है, ख़ुदाए बरतर की क़सम वह झूठा है (अगर ऐसा ही है) तो फिर क्यों उसके आमाल में इस उम्मीद की झलक नुमायां नहीं होती जबके हर उम्मीदवार के कामों में उम्मीद की पहचान हो जाया करती है। सिवाये उस उमीद के जो अल्लाह से लगाई जाए के उसमें खोट पाया जाता है और हर ख़ौफ़ व हेरास जो (दूसरों से हो) एक मुसल्लमए हक़ीक़त रखता है, मगर अल्लाह का ख़ौफ़ ग़ैर यक़ीनी है और अल्लाह से बड़ी चीज़ों का और बन्दों से छोटी चीज़ों का उम्मीदवार होता है फिर भी जो आजिज़ी का रवैया बन्दों से रखता है वह रवय्या अल्लाह से नहीं बरतता तो आखि़र क्या बात है के अल्लाह के हक़ में इतना भी नहीं किया जाता जितना बन्दों के लिये किया जाता है क्या तुम्हें कभी इसका अन्देषा हुआ है के कहीं तुम इन उम्मीदों (के दावों ) में झूटे तो नहीं? या यह के तुम महले उम्मीद ही नहीं समझते। यूंही इन्सान अगर उसके बन्दों में से किसी बन्दे से डरता है तो जो ख़ौफ़ की सूरत इसके लिये इख़्तेयार करता है अल्लाह के लिये वैसी सूरत इख़्तेयार नहीं करता, इन्सानों का ख़ौफ़ तो उसने नक़द की सूरत में रखा है और अल्लाह का डर सिर्फ़ टाल मटोल और (ग़लत सलत) वादे यूंही जिसकी नज़रों में दुनिया अज़मत पा लेती है और उसके दिल में इसकी अज़मत व वुसअत बढ़ जाती है तो वह उसे अल्लाह पर तरजीह देता है और उसकी तरफ़ मुड़ता है और उसी का बन्दा होकर रह जाता है। तुम्हारे लिये रसूलल्लाह (स0) का क़ौल व अमल पैरवी के लिये काफ़ी है और उनकी ज़ात दुनिया के ऐब व नुक़्स और उसकी रूसवाइयों और बुराइयों की कसरत दिखाने के लिये रहनुमा है। इसलिये के इस दुनिया के दामनों को उससे समेट लिया गया और दूसरों के लिये उसकी वुसअतें मुहय्या कर दी गईं और इस (ज़ाले दुनिया की छातियों से) आपका दूध छुड़ा दिया गया अगर दूसरा नमूना चाहो तो मूसा कलीमुल्लाह हैं के जिन्होंने अपने अल्लाह से कहा के परवरदिगार! तू जो कुछ भी इस वक़्त थोड़ी बहुत नेमत भेज देेगा मैं उसका मोहताज हूं। ख़ुदा की क़सम उन्होंने सिर्फ़ खाने के लिये रोटी का सवाल किया था, चूंके वह ज़मीन का साग पात खाते थे और लाग़री और (जिस्म पर) गोष्त की कमी की वजह से उनके पेट की नाज़ुक जिल्द से घास पात की सब्ज़ी दिखाई देती थी, अगर चाहो तो तीसरी मिसाल दाऊद (अ0) की सामने रख लो, जो साहबे ज़बूर और अहले जन्नत के क़ारी हैं, वह अपने हाथ से खजूर की पत्तियों की टोकरियां बनाया करते थे और अपने साथियों से फ़रमाते थे के तुममें से कौन है जो इन्हें बेच कर मेरी दस्तगीरी करे (फिर) जो उसकी क़ीमत मिलती उससे जौ की रोटी खा लेते थे, अगर चाहो तो ईसा इब्ने मरयम (अ0) का हाल कहो के जो (सर के नीचे) पत्थर का तकिया रखते थे सख़्त और खुरदुरा लिबास पहनते थे और (खाने) में सालन के बजाय भूक और रात के चिराग़ की जगह चान्द और सर्दियों में साये के बजाये (उनके सर पर) ज़मीन के मषरिक़ व मग़रिब का साएबान होता था और ज़मीन जो घास फूस चैपायों के लिये उगाती थी वह उनके लिये फल फूल की जगह थी न उनकी बीवी थीं जो उन्हें दुनिया (के झंझटों) में मुब्तिला करतीं और न बाल बच्चे थे के उनके लिये फ़िक्र व अन्दोह का सबब बनते और न माल व मताअ था के उनकी तवज्जो को मोड़ता और न कोई तमअ थी के उन्हें रूसवा करती। उनकी सवारी उनके दोनों पांव और ख़ादिम उनके दोनों हाथ थे। तुम अपने पाक व पाकीज़ा नबी (स0) की पैरवी करो चूंके उनकी ज़ात इत्तेबाअ करने वाले के लिये नमूना औश्र सब्र करने वाले के लिये ढारस है। उनकी पैरवी करने वाला और उनके नक़्षे क़दम पर चलने वाला ही अल्लाह को सबसे ज़्यादा महबूब है जिन्होंने दुनिया को (सिर्फ़ ज़रूरत भर) चखा और उसे नज़र भर कर नहीं देखा वह दुनिया में सबसे ज़्यादा षिकम तही में बसर करने वाले और ख़ाली पेट रहने वाले थे। उनके सामने दुनिया की पेषकष की गई तो उन्होंने उसे क़ुबूल करने से इन्कार कर दिया और (जब) जान लिया के अल्लाह ने एक चीज़ को बुरा जाना है तो आप (अ0) ने भी उसे बुरा ही जाना और अल्लाह ने एक चीज़ को हक़ीर समझा है तो आपने भी उसे हक़ीर ही समझा और अल्लाह ने एक चीज़ को पस्त क़रार दिया है तो आप ने भी उसे पस्त ही क़रार दिया। अगर हम में सिर्फ़ यही एक चीज़ हो के हम उस “ौ को चाहने लगें जिसे अल्लाह और रसूल (स0) बुरा समझते हैं तो अल्लाह की नाफ़रमानी और उसके हुक्म से सरताबी के लिये यही बहुत है। रसूलल्लाह (स0) ज़मीन पर बैठकर खाना खाते थे और ग़ुलामों की तरह बैठते थे, अपने हाथ से जूती टांकते थे और अपने हाथों से कपड़ों में पेवन्द लगाते थे और बेपालान के गधे पर सवार होते थे और अपने पीछे किसी को बिठा भी लेते थे, घर के दरवाज़े पर (एक दफ़ा) ऐसा पर्दा पड़ा था जिसमें तसवीरें थें तो आपने अपनी अज़वाज में से एक को मुख़ातब करके फ़रमाया इसे मेरी नज़रों से हटा दो, जब मेरी नज़रें इस पर होती हैं तो मुझे दुनिया और इसकी आराइषें याद आ जाती हैं। आपने दुनिया से दिल हटा लिया था और उसकी याद तक अपने नफ़्स से मिटा डाली थी और यह चाहते थे के उसकी सज धज निगाहों से पोषीदा रहे ताके न उससे उम्दा उम्दा लिबास हासिल करें और न उसे अपनी मन्ज़िल ख़याल करें और न उसमें ज़्यादा क़याम की आस लगाएं। उन्होंने इसका ख़याल नफ़्स से निकाल दिया और दिल से उसे हटा दिया था और निगाहों से उसे ओझल रखा था, यूंही जो शख़्स किसी “ौ को बुरा समझता है तो न उसे देखना चाहता है और न उसका ज़िक्र सुनना गवारा करता है। रसूलल्लाह (स0) (के आदात व ख़साएल) में ऐसी चीज़ें हैं के वह तुम्हें दुनियां के उयूब व क़बाएह का पता देंगी जबके आप (स0) इस दुनिया में अपने ख़ास अफ़राद समेत भूके रहा करते थे और बावजूद इन्तेहाई क़र्ब मन्ज़िलत के इसकी आराइषें इनसे दूर रखी गईं। चाहे के देखने वाला अक़्ल की रौषनी में देखे के अल्लाह ने उन्हें दुनिया न देकर उनकी इज़्ज़त बढ़ाई है या अहानत की है अगर कोई यह कहे के अहानत की है तो उसने झूठ कहा है और बहुत बड़ा बोहतान बान्धा और अगर यह कहे के इज़्ज़त बढ़ाई है तो उसे यह जान लेना चाहिये के अल्लाह ने दूसरों की बे इज़्ज़ती ज़ाहिर की जबके उन्हें दुनिया की ज़्यादा से ज़्यादा वुसअत दे दी और उसका रूख़ अपने मुक़र्रबतरीन बन्दे से मोड़ रखा। पैरवी करने वाले को चाहिये के इनकी पैरवी करे और उनके निषाने क़दम पर चले और उन्हीं की मन्ज़िल में आए वरना हलाकत से महफ़ूज़ नहीं रह सकता। क्यूंकि अल्लाह ने इनको (क़ुर्ब) क़यामत की निषानी और जन्नत की ख़ुषख़बरी सुनाने वाला और अज़ाब से डराने वाला क़रार दिया है। दुनिया से आप (स0) भूके निकल खड़े हुए और आखि़रत में सलामतियों के साथ पहुंच गए। आप (स0) ने तामीर के लिये कभी पत्थर पर पत्थर नहीं रखा, यहाँ तक के आखि़रत की राह पर चल दिये और अल्लाह की तरफ़ बुलावा देने वाले की आवाज़ पर लब्बैक कही। यह अल्लाह का हम पर कितना बड़ा एहसान है के उसने हमें एक पेषरौ व पेषवा जैसी नेमत बख़्षी के जिनकी हम पैरवी करते हैं और क़दम ब क़दम चलते हैंं (इन्हीं की पैरवी में) ख़ुदा की क़सम मैंने अपनी इस क़मीज़ में इतने पैवन्द लगाए हैं के मुझे पैवन्द लगाने वाले से शर्म आने लगी है, मुझसे एक कहने वाले ने कहा के क्या आप इसे उतारेंगे नहीं? तो मैंंने उसे कहा के मेरी (नज़रों से) दूर हो के सुबह के वक़्त ही लोगों को रात के चलने की क़द्र होती है और वह उसकी मदहा करते हैं।

(((-जब इन्सान उन्हीं मख़लूक़ात के इदराक से आजिज़ हों के सामने आ रही हैं जो इदराक व एहसास के हुदूद के अन्दर हैं तो उन मख़लूक़ात के बारे में क्या कहा जा सकता है जो इन्सानी हवास की ज़द से बाहर हैं और जिन तक अक़्ल की रसाई नहीं है और जब मख़लूक़ात की हक़ीक़त तक इन्सानी फ़िक्र की रसाई नहीं है तो ख़ालिक़ की हक़ीक़त का इरफ़ान किस तरह मुमकिन है और इन्सान इसकी हम्द का हक़ किस तरह अदा कर सकता है। इन्सान की निजात व आख़ेरत के दो बुनियादी रूकन हैं एक ख़ौफ़ और एक उम्मीद, इस्लाम ने क़दम-क़दम पर इन्हीं दो चीज़ों की तरफ़ तवज्जो दिलाई है और इन्हें ईमान और अमल का ख़ुलासा क़रार दिया है। सूरा मुबारकए हम्द जिस में सारा क़ुरान सिमटा हुआ है। इसमें भी रहमान व रहीम उम्मीद का इषारा और मालिके यौमिद्दीन ख़ौफ़ का, लेकिन अफ़सोसनाक बात यह है के इन्सान न वाक़ेअन ख़ुदा से उम्मीद रखता है और न उससे ख़ौफ़ज़दा होता है। उम्मीदवार होता तो दुआओं और इबादतों में दिल लगता के इनमें तलब ही तलब पाई जाती है और ख़ौफ़ज़दा होता तो गुनाहों से परहेज़ करता के गुनाह ही इन्सान को अज़ाबे अलीम से दो-चार कर देते हैं।  दुनिया की हर उम्मीद और इसके हर ख़ौफ़ का किरदार से नुमायां हो जाना और आख़ेरत की उम्मीद वहम का वाज़ेअ न होना इस बात की अलामत है के दुनिया इसके किरदार में एक हक़ीक़त है और आख़ेरत सिर्फ़ अलफ़ाज़ का मजमूआ और तलफ़्फ़ुज़ की बाज़ीगरी है और इसके अलावा कुछ नहीं है। वाज़ेअ रहे के पर्दे वाले वाक़ेए का ताल्लुक़ अज़वाज की ज़िन्दगी और उनके घरों से है। इसका अहलेबैत (अ0) के घर से कोई ताल्लुक़ नहीं है जिसे बाज़ रावियों ने अहलेबैत (अ0)की तरफ़ मोड़ दिया है ताके उनकी ज़िन्दगी में भी ऐष व इषरत का इसबात कर सकें। जबके अहलेबैत (अ0) की ज़िन्दगी तारीख़े इस्लाम में मुकम्मल तौर पर आईना है और हर शख़्स जानता है के इन हज़रात ने तमामतर इख़्तेयारात के बावजूद अपनी ज़िन्दगी इन्तेहाई सादगी से गुज़ारी है और सारा माले दुनिया राहे ख़ुदा में ख़र्च कर दिया है-      पैग़म्बरों की ज़िन्दगी की मिसाल का मतलब यह नहीं है के मुसलमान को आवारावतन और ख़ानाबदोष होना चाहिये और ख़ेमों और छोलदारियों में ज़िन्दगी गुज़ार देना चाहिये, इसका मक़सद सिर्फ़ यह है के मुसलमान को दुनिया की अहमियत व अज़मत का क़ायल नहीं होना चाहिये और उसे सिर्फ़ बतौर ज़रूरत और बक़द्र ज़रूरत इस्तेमाल करना चाहिये वह मुकम्मल तौर से क़ब्ज़े में आ जाए तो इन्सान को बाइज्ज़त नहीं बना सकती है और सौ फ़ीसदी हाथों से निकल जाए तो ज़लील नहीं कर सकती है, इज़्ज़त व ज़िल्लत का मेयार माल व दौलत और जाह व मन्सब नहीं है, इसका मेयार सिर्फ़ इबादते इलाही और इताअते परवरदिगार है जिसके बाद मुल्क दुनिया की कोई हैसियत नहीं रह जाती है।)))
 161-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जिसमें रसूले अकरम (स0) के सिफ़ात, अहलेबैत (अ0) की फ़ज़ीलत और तक़वा व इत्तेबाअ रसूल (स0) की दावत का तज़किरा किया गया है)

परवरदिगार ने आपको रोषन नूर, वाज़ेह दलील, नुमायां रास्ता और हिदायत करने वाली किताब के साथ भेजा है। आपका ख़ानदान बेहतरीन ख़ानदान, और आपका शजरा बेहतरीन शजरा है, जिसकी शाख़ें मोअतदिल हैं (सीधी हैं) और समरात दस्त-रस के अन्दर (झुके हुए) हैं। आपकी जाए विलादत मक्के मुकर्रमा है और मक़ामे हिजरत अर्ज़े तय्यबा। यहीं से आपका ज़िक्र बलन्द हुआ है और यहीं से आपकी आवाज़ फै़ली है। परवरदिगार ने आपको किफ़ायत करने वाली हुज्जत, षिफ़ा देने वाली नसीहत, गुज़िष्ता तमाम उमूर की तलाफ़ी करने वाली दावत के साथ भेजा है, आपके ज़रिये ग़ैर मारूफ़ शरीअतों को ज़ाहिर किया है और महमिल बिदअतों का क़िला क़मा कर दिया है और वाज़ेह एहकाम को बयान कर दिया है लेहाज़ा अब जो भी इस्लाम के अलावा किसी रास्ते को इख़्तेयार करेगा उसकी शक़ावत साबित हो जाएगी और रसीमाने हयात बिखर जाएगी और मुंह के बल गिरना सख़्त हो जाएगा और अन्जामकार दाएमी हुज़्न व इल्म और शदीदतरीन अज़ाब होगा।

मैं ख़ुदा पर इसी तरह भरोसा करता हूं जिस तरह उसकी तरफ़ तवज्जो करने वाले करते हैं और उससे उस रास्ते की हिदायत तलब करता हूँ जो उसकी

जन्नत तक पहुंचाने वाला और उसकी मन्ज़िले मतलूब की तरफ़ ले जाने वाला है।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही और इसकी इताअत की वसीयत करता हूं के इसी में कुल निजात है और यही हमेषा के लिये मरकज़े निजात है। उसने तुम्हें डराया तो मुकम्मल तौर से डराया और (जन्नत की) रग़बत दिलाई तो मुकम्मल रग़बत का इन्तेज़ाम किया, तुम्हारे लिये दुनिया आर उसकी जुदाई, उसके फ़ना व ज़वाल और उससे इन्तेक़ाल सबकी तौसीफ़ कर दी है लेहाज़ा उसमें जो चीज़ अच्छी लगे उससे एराज़ करो (पहलू बचाए रखो) के साथ जाने वाली “ौ बहुत कम है (जान लो) यह (दुनिया का) घर ग़ज़बे इलाही से क़रीबतर और रिज़ाए इलाही से दूरतर है।  

बन्दगाने ख़ुदा! हम-व-ग़म और इसके इष्ग़ाल से चष्मपोषी कर लो (इसकी फ़िक्रों और उसके धन्दों से आंखें बन्द कर लो) तुम्हें मालूम है के इससे बहरहाल जुदा होना है और इसके हालात बराबर बदलते रहते हैं इससे इस तरह एहतियात करो जिस तरह एक ख़ौफ़ज़दा और अपने नफ़्स का मुख़लिस और जाँफ़ेषानी के साथ कोषिष करने वाला एहतियात करता है और उससे इबरत हासिल करो उन मनाज़िर के ज़रिये जो तुमने ख़ुद देख लिये हैं के गुज़िष्ता नस्लें हलाक हो गईं, उनके जोड़ बन्द अलग-अलग हो गए, उनकी आंखें और उनके कान ख़त्म हो गए, उनकी शराफ़त और इज़्ज़त चली गई, उनकी मसर्रत और नेमत का ख़ात्मा हो गया। औलाद का क़ुर्ब फ़िक़दान में तब्दील हो गया और अज़वाज की सोहबत फ़िराक़ में बदल गई। अब न बाहमी सिफ़ाख़रत रह गई है और न नस्लों का सिलसिला, न मुलाक़ातें रह गई हैं और न बात-चीत। (उनका शरफ़ व वक़ार मिट गया, उनकी मसर्रतें और नेमतें जाती रहीं और बाल बच्चों के क़रीब के बजाए अलाहेदगी और बीवियों से हमनषीनी के बजाए उनसे जुदाई हो गई। अब न वह फ़ख़्र करते हैं और न उनके औलाद होती है, न एक दूसरे से मिलते मिलाते हैं और न आपस में एक दूसरे के हमसाया बन कर रहते हैं।) 

लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा! डरो उस शख़्स की तरह जो अपने नफ़्स पर क़ाबू रखता हो, अपनी ख़्वाहिषात को रोक सकता हो और अपनी अक़्ल की आंखों से देखता हो, मसएल बिलकुल वाज़ेह है, निषानियां क़ायम हैं, रास्ता सीधा है और सिरात बिल्कुल मुस्तक़ीम है।

162- आपका इरषादे गिरामी (उस शख़्स से जिसने यह सवाल कर लिया के लोगों ने आपको आपकी मन्ज़िल से किस तरह हटा दिया)

ऐ बरादरे बनी असद! तुम बहोत तंग हौसला हो और ग़लत रास्ते पर चल पड़े हो, लेकिन बहरहाल तुम्हें क़राबत (-1-) का हक़ भी हासिल है और सवाल का हक़ भी है और तुमने दरयाफ़्त भी कर लिया है तो अब सुनो! हमारे बलन्द नसब रसूले अकरम (स0) से क़रीबतरीन ताल्लुक़ के बावजूद क़ौम ने हमसे इस हक़ को इसलिये छीन लिया के इसमें एक ख़ुदग़र्ज़ी थी जिस पर एक जमाअत (-2-) के नफ़्स मर मिटे थे और दूसरी जमाअत ने चष्मपोषी से काम लिया था लेकिन बहरहाल हाकिम अल्लाह है और रोज़े क़यामत उसी की बारगाह में पलट कर जाना है। इस लूट मार का ज़िक्र छोड़ो जिसका शोर चारों तरफ़ मचा हुआ था (-3-) अब ऊंटनियों की बात करो जो अपने क़ब्ज़े में रह कर निकल गई हैं (((-1-षायद इस अम्र की तरफ़ इषारा हो के सरकारे दो आलम (स0) की एक ज़ौजा ज़ैनब बिन्त जहष असदी थीं और उनकी वालेदा असीमा बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब आपकी फूफी थीं। -2- इसमें दोनों इहतमालात पाए जाते हैं, या उस क़ौम की तरफ़ इषारा है जिसने हक़्क़े अहलेबैत (अ0) का तहफ़्फ़ुज़ नहीं किया और तग़ाफ़ुल से काम लिया। या ख़ुद अपने करदार की बलन्दी की तरफ़ इषारा है के हमने भी चष्म पोषी से काम लिया और मुक़ाबला करना मुनासिब नहीं समझा और इस तरह ज़ालिमों ने मन्सब पर मुकम्मल तौर से क़ब्ज़ा कर लिया।
-3- यह अम्र अलक़ैस का मिसरा है जब उसके बाप को क़त्ल कर दिया गया तो वह इन्तेक़ाम के लिये क़बाएल की कमक तलाष कर रहा था एक मक़ाम पर मुक़ीम था के लोग उसके ऊंट पकड़ ले गए, उसने मेज़बान से फ़रयाद की, मेज़बान ने कहा के मैं अभी वापस लाता हूं सबूत में तुम्हारी ऊंटनियां ले जाता हूँ और इस तरह ऊंट के साथ ऊंटनी पर भी क़ब्ज़ा कर लिया-)))

अब आओ इस मुसीबत को देखो जो अबू सुफ़ियान के बेटे की तरफ़ से आई है के ज़माने ने रूलाने के बाद हंसा दिया है और बख़ुदा इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है। ताज्जुब तो इस हादिस (मुसीबत) पर है जिसने ताज्जुब (की हद) का भी ख़ात्मा कर दिया है और कजी को बढ़ावा दिया है। क़ौम ने चाहा था के नूरे इलाही को उसके चिराग़ ही से रूपोष कर दिया जाए (अल्लाह के रौषन चिराग़ का नूर बुझाना चाहा) और फ़व्वारे को चष्मा (सरचष्मए हिदायत) ही से बन्द कर दिया जाए। मेरे और अपने दरम्यान ज़हरीले घूंटों की आमेज़िष कर दी के अगर मुझसे और क़ौम के दरम्यान से इब्तेला की ज़हमतें ख़त्म हो गईं तो मैं उन्हें ख़ालिस हक़ के रास्ते पर चलाऊंगा और अगर कोई दूसरी सूरत हो गई तो तुम्हें हसरत व अफ़सोस से तुम्हें जान नहीं देनी चाहिये। अल्लाह इनके आमाल से ख़ूब बाख़बर है।

163-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

सारी तारीफ़े उस अल्लाह के लिये हैं जो बन्दों का ख़ल्क़ करने वाला, ज़मीन का फ़र्ष बिछाने वाला, वदियों में पानी का बहाने वाला और टीलों को सरसब्ज़ व शादाब बनाने वाला है। उसकी औलियत की कोई इब्तेदा नहीं है और इसकी अज़लियत की कोई इन्तेहा नहीं है। वह इब्तेदा से है और हमेषा रहने वाला है। वह बाक़ी है और उसकी बक़ा की कोई मुद्दत नहीं है। पेषानियां उसके सामने सजदारेज़ और लब उसकी वहदानियत का इक़रार करने वाले हैं। उसने तख़लीक़ के साथ ही हर “ौ के हुदूद मुअय्यन कर दिये हैं ताके वह किसी से मुषाबेह न होने पाएं। इन्सानी औहाम उसके लिये हुदूद व हरकात और आज़ा व जवारेह का तअय्युन नहीं कर सकते हैं। इसके लिये यह नहीं कहा जा सकता है के वह कब से है और न यह हद बन्दी की जा सकती है के कब तक रहेगा वह ज़ाहिर है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है के किस चीज़ से और बातिन है लेकिन यह नहीं सोचा जा सकता है के किस चीज़ में? वह न कोई ढांचा है के ख़त्म हो जाए और न किसी हिजाब में है के महदूद हो जाए। ज़ाहेरी इत्तेसाल की बुनियाद पर अष्याअ इससे क़रीब नहीं हैं और जिस्मानी जुदाई की बिना पर दूर नहीं है। इसके ऊपर बन्दों के हालात में से न एक का झीकना मख़फ़ी है और न अलफ़ाज़ का दोहराना। न बलन्दी का दूर से झलकना पोषीदा है और न क़दम का आगे बढ़ना, न अन्धेरी रात में और न छाई हुई अन्धियारियों में जिन पर रोषन चान्द अपनी किरनों का साया डालता है और रौषन आफ़ताब तुलूअ व ग़ुरूब में और ज़माने की इन गर्दिषों में जो आने वाली रात की आमद और जाने वाले दिन के गुज़रने से पैदा होती हैं। वह हर इन्तेहा व मुद्दत से पहले है और हर एहसाए और शुमार से मावराए है। वह इन सिफ़ात से बलन्दतर है जिन्हें महदूद समझ लेने वाले इसकी तरफ़ मन्सूब कर देते हैं चाहे वह सिफ़तों के अन्दाज़े हों या इतराफ़ व जवानिब की हदें। मकानात में क़याम हो या मसाकिन में क़रार, हदबन्दी उसकी मख़लूक़ के लिये है और उसकी निस्बत इसके ग़ैर की तरफ़ होती है।

(((यह मकतबे अहलेबैत (अ0) का ख़ासा है के हमेषा हक़ के रास्ते पर चलना चाहिये और दूसरों को भी इसी रास्ते पर चलाना चाहिये और इस राह में किसी तरह की ज़हमत व मुसीबत की परवाह नहीं करना चाहिये, चुनांचे बाज़ मोअर्रेख़ीन के बयान के मुताबिक़ जब दौरे उमर बिन ख़त्ताब में सलमान फ़ारसी को मदाएन का गवर्नर बनाया गया और उन्होंने कारोबार की निगरानी का क़ानून नाफ़िज़ किया तो अरबाबे सरवत व तिजारत ने खलीफ़ा से षिकायत कर दी और उन्होंने फ़िलज़ोर जनाबे सलमान को माज़ूल कर दिया के कहीं निगरानी और मुहासेबा का तसव्वुर सारे मुल्क में न फैल जाए के अरबाबे मसालेह व मुनाफ़ेअ बग़ावत पर आमादा हो जाएं और हुकूमत को हक़ की राह पर चलने के लिये ख़ातिर ख़्वाह क़ीमत अदा करना पड़े। (फ़ी ज़लाल नहजुल बलाग़ा (2/448) -)))

उसने अष्याए की तख़लीक़ न अज़ली मवाद से की है और न अबदी मिसालों से, जो कुछ भी ख़ल्क़ किया है ख़ुद ख़ल्क़ किया है और उसकी हदें मुअय्यन कर दी हैं और हर सूरत को हसी बना दिया है। कोई “ौ भी इसके हुक्म से सरताबी नहीं कर सकती है और न किसी की इताअत में उसका कोई फ़ायदा है। उसका इल्म माज़ी के मरने वाले अफ़राद के बारे में वैसा ही है जैसा के रह जाने वाले ज़िन्दों के बारे में है। और वह बलन्दतरीन आसमानों के बारे में वैसा ही इल्म रखता है जिस तरह के पस्त तरीन ज़मीनों के बारे में रखता है।

(दूसरा हिस्सा) ऐ वह इन्सान जिसे हर एतबार से दुरूस्त बनाया गया है और रहम के अन्धेरों और पर्दा दर पर्दा ज़ुल्मतें मुकम्मल निगरानी के साथ ख़ल्क़ कया गया है। तेरी इब्तेदा ख़ालिस मिट्टी से हुई है और तुझे एक ख़ास मरकज़ में ख़ास मुद्दत तक रखा गया है। तू षिकमे मादर में इस तरह हरकत कर रहा था के न आवाज़ का जवाब दे सकता था और न किसी को सुन सकता था। इसके बाद तुझे वहाँ से निकाल कर उस घर में लाया गया जिसे तूने देखा भी नहीं था और जहां के मुनाफ़ेअ के रास्तों से बाख़बर भी नहीं था। बता तुझे पिस्ताने मादर से दूध हासिल करने की हिदायत किसने दी है और ज़रूरत के वक़्त मवारिद तलब व इरादे का पता किसने बताया है? होषियार, जो शख़्स एक साहबे हैसियत व आज़ाए मख़लूक़ के सिफ़ात के पहचानने से आजिज़ होगा वह ख़ालिक़ के सिफ़ात को पहचानने से यक़ीनन ज़्यादा आजिज़ होगा और मख़लूक़ात के हुदूद के ज़रिये उसे हासिल करने से यक़ीनन दूरतर होगा।

(((- अमीरूल मोमेनीन (अ0) के अलावा दुनिया का कोई दूसरा इन्सान होता तो इस मौक़े को ग़नीमत तसव्वुर करके एहतेजाज करने वालों के हौसले मज़ीद बलन्द कर देता और लम्हों में उस्मान का ख़ात्मा करा देता लेकिन आपने अपनी शरई ज़िम्मेदारी और इस्लामी सहूलियत का ख़याल करके इन्क़ेलाबी जमाअत को रोका और चाहा के पहले एतमामे हुज्जत कर दिया जाए ताके उस्मान को इस्लाहे अम्र का तवक़ोअ मिल जाए और बनी उमय्या मुझे नस्ले उस्मान का मुलज़िम न ठहराने पाएं। वरना उस्मान के दौर के मज़ालिम आलम आष्कार थे। उनके बारे में किसी तहक़ीक़ और तफ़तीष की ज़रूरत नहीं थी। जनाबे अबूज़र का शहरबदर करा दिया जाना, जनबो अब्दुल्लाह बिन मसऊद की पस्लियों का तोड़ दिया जाना, जनबो अम्मारे यासिर के षिकम को जूतियों से पामाल कर देना, वह मज़ालिम हैं जिन्हें सारा आलमे इस्लाम और बालनहूस मदीनतुर्ररसूल ख़ूब जानता था और यही वजह है के आपने दरम्यान में पड़ कर इस्लाह हाल के बारे में यह फ़ारमूला पेष किया के मदीने के मामेलात की फ़िलफ़ौर इस्लाह की जाए और बाहर के लिये बक़द्रे ज़रूरत मोहलत ले ली जाए लेकिन ख़लीफ़ा को इस्लाह नहीं करना थी नहीं की, और आखि़रष वही अन्जाम हुआ जिसके पेषे नज़र अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने इस क़द्र ज़हमत बरदाष्त की थी और जिसके बाद बनी उमय्या को नए फ़ित्नों का मौक़ा मिल गया और उनसे अमीरूल मोमेनीन (अ0) को भी दो चार होना पड़ा था।-)))

164- आपका इरषादे गिरामी  (जब लोगों ने आपके पास आकर उस्मान के मज़ालिम का ज़िक्र किया

और उनकी फ़हमाइष और तम्बीह का तक़ाज़ा किया तो आपने उस्मान के पास जाकर फ़रमाया)

लोग मेरे पीछे मुन्तज़िरि हैं और उन्होंने मुझे अपने और तुम्हारे दरम्यान वास्ता क़रार दिया है और ख़ुदा की क़सम मैं नहीं जानता हूँ के मैं तुमसे क्या कहूं? मैं कोई ऐसी बात नहीं जानता हूं जिसका तुम्हें इल्म न हो और किसी ऐसी बात की निषानदेही नहीं कर सकता हूं जो तुम्हें मालूम न हो। तुम्हें तमाम वह बातें मालूम हैं जो मुझे मालूम हैं और मैंने किसी अम्र की तरफ़ सबक़त नहीं की है के उसकी इत्तेलाअ तुम्हें करूं और न कोई बात चुपके से सुन ली है के तुम्हें बाख़बर करूं। तुमने वह सब ख़ुद देखा है जो मैंने देखा है और वह सब कुछ ख़ुद भी सुना है जो मैंने सुना है और रसूले अकरम (स0) के पास वैसे ही रहे हो जैसे मैं रहा हूँ। इब्ने अबी क़हाफ़ा और इब्निल ख़त्ताब हक़ पर अमल करने के लिये तुमसे ज़्यादा ऊला नहीं थे के तुम उनकी निस्बत रसूलल्लाह से ज़्यादा क़रीबी रिष्ता रखते हो।

तुम्हें वह दामादी का शरफ़ भी हासिल है जो उन्हें हासिल नहीं था लेहाज़ा ख़ुदारा अपने नफ़्स को बचाओ के तुम्हें अन्धेपन से बसारत या जेहालत से इल्म ........ दिया जा रहा है। रास्ते बिल्कुल वाज़ेअ हैं और निषानाते दीन क़ायम हैं। याद रखो ख़ुदा के नज़दीक बेहतरीन बन्दा वह इमामे आदिल है जो ख़ुद हिदायत याफ़्ता हो और दूसरों को हिदायत दे। जानी पहचानी सुन्नत को क़ायम करे और मजहोल बिदअत को मुर्दा बना दे। देखो ज़िया बख़्ष सुन्नतों के निषानात भी रौषन हैं और बिदअतों के निषानात भी वाज़ेह हैं और बदतरीन इन्सान ख़ुदा की निगाह में वह ज़ालिम पेषवा है जो ख़ुद भी गुमराह हो और लोगों को भी गुमराह करे।  पैग़म्बर से मिली हुई सुन्नतों को मुर्दा बना बना दे आर क़ाबिले तर्क बिदअतों को ज़िन्दा कर दे। मैंने रसूले अकरम (स0) को यह फ़रमाते हुए सुना है के रोज़े क़यामत ज़ालिम रहनुमा को इस आलम में लाया जाएगा के न कोई उसका मददगार होगा और न उज़्र ख़्वाही करने वाला और उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा और वह इस तरह चक्कर खाएगा जिस तरह चक्की। इसके बाद उसे क़ारे जहन्नम में जकड़ दिया जाएगा। मैं तुम्हें अल्लाह की क़सम देता हूं के ख़ुदारा तुम इस उम्मत के मक़तूल पेषवा न बनो इसलिये के दौरे क़दीम से कहा जा रहा है के इस उम्मत में एक पेषवा क़त्ल किया जाएगा जिसके बाद क़यामत तक क़त्ल व के़ताल का दरवाज़ा खुल जाएगा और सारे उमूर मुष्तबा हो जाएंगे और फ़ित्ने फैल जाएंगे और लोग हक़ व बातिल में इम्तियाज़ न कर सकेंगे और इसी में चक्कर खाते रहेंगे और तहो बाला होते रहेंगे। ख़ुदारा मरवान की सवारी न बन जाओ के वह जिधर चाहे खींच कर ले जाए के तुम्हारा सिन ज़्यादा हो चुका है और तुम्हारी उम्र ख़ात्मे के क़रीब आ चुकी है। उस्मान ने इस सारी गुफ़्तगू को सुनकर कहा के आप उन लोगों से कह दे ंके ज़रा मोहलत दें ताके मैं उनकी हक़ तलफ़ियों का इलाज कर सकूं? आपने फ़रमाया के जहां तक मदीने के मामेलात का ताल्लुक़ है उनमें किसी मोहलत की कोई ज़रूरत नहीं है और जहां तक बाहर के मामलात का ताल्लुक़ है उनमें सिर्फ़ इतनी मोहलत दी जा सकती है के तुम्हारा हुक्म वहां पहुंच जाए।

(((-दर हक़ीक़त रहनुमा और ज़ालिम वह दो मुतज़ाद अलफ़ाज़ हैं जिन्हें किसी आलमे शराफ़त व करामत में जमा नहीं होना चाहिये, इन्सान को रहनुमाई का शौक़ है तो पहले अपने किरदार में अदालत व शराफ़त पैदा करे उसके बाद आगे चलने का इरादा करे। इसके बग़ैर रहनुमाई का शौक़ इन्सान को जहन्नम तक पहुंचा सकता है रहनुमा नहीं बना सकता है। जैसा के सरकारे दो आलम (स0) ने फ़रमाया है और इस अज़ाब की षिद्दत का राज़ यही है के रहनुमा की वजह से बेषुमार लोग मज़ीद गुमराह होते हैं और उसके ज़ुल्म से बेहिसाब लोगों को ज़ुल्म का जवाज़ फ़राहम हो जाता है और सारा मुआषेरा तबाह व बरबाद होकर रह जाता है। उस्मान का दौर पहला दौर था जब साबिक़ की ज़ाहिरदारी भी ख़त्म हो गई थी और खुल्लम खुल्ला ज़ुल्म का बाज़ार गर्म हो गया था। इसलिये इतना शदीद रद्दे अमल देखने में आया और न इसके बाद से तो आज तक सारा आलमे इन्सान उन्हीं ख़ानदान परवरियों का षिकार है और अवाम की सारी दौलत एक-एक  ख़ानदान के अय्याष शहज़ादों पर सर्फ़ हो रही है और मदीने के मुसलमानों में भी ग़ैरत की हरकत नहीं पैदा हो रही है तो बाक़ी आलमे इस्लाम और दूसरे इलाक़ों का क्या तज़किरा है।-)))