True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

138-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें मुस्तक़बिल के हवादिस का इषारा है)

वह बन्दए ख़ुदा ख़्वाहिषात को हिदायत की तरफ़ मोड़ देगा जब लोग हिदायत को ख़्वाहिषात की तरफ़ मोड़ रहे होंगे और वह राय को क़ुरआन की तरफ़ झुका देगा जब लोग क़ुरान को राय की तरफ़ झुका रहे होंगे।

(दूसरा हिस्सा) यहाँ तक के जंग अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी दांत निकाले हुए और थनों को पुर किये हुए, लेकिन इस तरह के इसका दूध पीने में शीरीं मालूम होगा और अन्जाम बहुत बुरा होगा। याद रखो के कल और कल बहुत जल्द वह हालात लेकर आने वाला है जिसका तुम्हें अन्दाज़ा नहीं है। इस जमाअत से बाहर का वाली तमाम अम्माल की बदआमालियों का मुहासेबा करेगा और ज़मीन तमाम जिगर के ख़ज़ानों को निकाल देगी और निहायत आसानी के साथ अपनी कुन्जियां उसके हवाले कर देगी और फिर वह तुम्हें दिखलाएगा के आदिलाना सीरत क्या होती है और मुर्दा किताब व सुन्नत को किस तरह ज़िन्दा किया जाता है।

(तीसरा हिस्सा) मैं यह मन्ज़र देख रहा हूँ के एक शख़्स (दाई बातिल) शाम में ललकार रहा है और कूफ़े के गिर्द उसके झण्डे लहरा रहे हैं और इसकी तरफ़ काट खाने वाली ऊंटनी की तरह मुतवज्जो है और ज़मीन पर सरों का फ़र्ष बिछा रहा है। उसका मुंह खुला हुआ है और ज़मीन पर इसकी धमक महसूस हो रही है। वह दूर-दूर तक जूलानियां दिखलाने वाला है और शदीदतरीन हमले करने वाला है। ख़ुदा की क़सम वह तुम्हें एतराफ़े ज़मीन में इस तरह मुन्तषिर कर देगा के सिर्फ़ उतने ही आदमी बाक़ी रह जाएंगे जैसे आंख में सुरमा, और फिर तुम्हारा यही हष्र रहेगा। यहां तक के अरबों की गुमषुदा अक़्ल पलट कर आ जाए लेहाज़ा अभी ग़नीमत है मज़बूत तरीक़े, वाज़ेअ आसार और इस क़रीबी अहद से वाबस्ता रहो जिसमें नबूवत के पाएदार आसार हैं और यह याद रखो के शैतान अपने रास्तों को हमवार रखता है ताके तुम उसके हर क़दम पर बराबर चलते रहो।

139- आपका इरषादे गिरामी (षूरा के मौक़े पर)

(याद रखो) के मुझसे पहले हक़ की दावत देने वाला, सिलए रहम करने वाला और जूदो करम का मुज़ाहिरा करने वाला कोई न होगा। लेहाज़ा मेरे क़ौल पर कान धरा और मेरी गुफ़्तगू को समझो के अनक़रीब तुम देखोगे के इस मसले पर तलवारें निकल रही हैं। अहद व पैमान तोड़े जा रहे हैं और में से बाज़ गुमराहों के पेषवा हुए जा रहे हैं और बाज़ जाहिलों के पैरोकार।

140- आपका इरषादे गिरामी (लोगों को बुराई से रोकते हुए)

देखो, लो लोग गुनाहों से महफ़ूज़ हैं और ख़ुदा ने उन पर इस सलामती का एहसान किया है उनके शायाने शान यही है के गुनाहगारों और ख़ताकारों पर रहम करें और अपनी सलामती का शुक्रिया ही इन पर ग़ालिब रहे और उन्हें इन हरकात से रोकता रहे। चे जाएक इन्सान ऐब लगाने वाला अपने किसी भाई की पीठ पीछे बुराई करे और उसके ऐब बयान करके तान व तिषना करे (ख़ुद ऐबदार हो और अपने भाई का ऐब बयान करे और उसके ऐब की बिना पर उसकी सरज़न्ष भी करे)। यह आखि़र ख़ुदा की उस परदा पोषी को क्यों नहीं याद करता के परवरदिगार ने उसके जिन उयूब को छिपाकर रखा है वह उससे बड़े हैं जिन पर यह सरज़न्ष कर रहा है और उस ऐब पर किस तरह मज़म्मत कर रहा है जिसका ख़ुद मुरतकब होता है और अगर बैनिया इसका मुरतकब नहीं होता है तो इसके अलावा दूसरे गुनाह करता है जो इससे भी अज़ीमतर हैं और ख़ुदा की क़सम अगर इससे अज़ीमतर नहीं भी हैं तो ज़रूर ही हैं और ऐसी सूरत में बुराई करने और सरज़न्ष करने की जराअत बहरहाल इससे भी अज़ीमतर है।

(((-इन्सानियत उस अहद ज़र्रीं के लिये सरापा इन्तज़ार है जब ख़ुदाई नुमाइन्दा दुनिया के तमाम हुक्काम का मुहासेबा करके अद्ल व इन्साफ़ का निज़ाम क़ायम कर दे और ज़मीन अपने तमाम ख़ज़ाने उगल दे। दुनिया में राहत व इतमीनान का दौरे दौरा हो और दीने ख़ुदा इक़्तेदारे कुल्ली का मालिक हो जाए।-)))

बन्दए ख़ुदा- दूसरे के ऐब बयान करने में जल्दी न कर शायद ख़ुदा ने उसे माफ़ कर दिया हो और अपने नफ़्स को मामूली समझ के उसके बारे में महफ़ूज़ तसव्वुर न करना शायद के ख़ुदा इसी पर अज़ाब कर दे। (अपने छोटे से छोटे गुनाह को भी मामूली न समझना शायद के इस पर तुझे अज़ाब हो) हर शख़्स को चाहिये के दूसरे के ऐब बयान करने से परहेज़ करे के उसे अपना ऐब भी मालूम है और अगर ऐब से महफ़ूज़ है तो इस सलामती के शुक्रिया ही में मषग़ूल रहे।

141- आपका इरषादे गिरामी (जिसमें ग़ीबत के सुनने से रोका गया है और हक़ व बातिल के फ़र्क़ को वाज़ेअ किया गया है।)

लोगों! जो शख़्स भी अपने भाई के दीन की पुख़्तगी और तरीक़ाए कार दुरूस्तगी का इल्म रखता है उसे उसके बारे में दूसरों के अक़वाल पर कान नहीं धरना चाहिये के कभी-कभी इन्सान तीरअन्दाज़ी करता है और इसका तीर ख़ता कर जाता है और बातें बनाता है और बातिल बहरहाल फ़ना हो जाता है और अल्लाह सबका सुनने वाला भी है और गवाह भी है। याद रखो के हक़ व बातिल में सिर्फ़ चार अंगुल का फासला होता है। 

लोगों ने अर्ज़ की हुज़ूर इसका क्या मतलब है? तो आपने आँख और कान के दरम्यान चार उंगलियाँ रख कर फ़रमाया बातिल वह है जो सिर्फ़ सुना-सुनाया होता है और हक़ वह है जो अपनी आँख से देखा हुआ होता है।

142- आपका इरषादे गिरामी (नाअहल के साथ एहसान करने के बारे में)

याद रखो के ग़ैर मुस्तहक़ के साथ एहसान करने वाले और ना अहल के साथ नेकी करने वाले के हिस्से में कमीने लोगों की तारीफ़ और बदतरीन अफ़राद की मदह व सना ही आती है और वह जब तक करम करता रहता है जेहाल (जाहिल) कहते रहते हैं के किस क़द्र करीम और सख़ी है यह शख़्स, हालाँके अल्लाह के मामले में यही शख़्स बख़ील भी होता है। 

देखो अगर ख़ुदा किसी शख़्स को माल दे तो उसका फ़र्ज़ है के क़राबतदारों का ख़याल रखे। मेहमान नवाज़ी करे। क़ैदियों और ख़स्ता हालों को आज़ाद कराए। फ़क़ीरों और क़र्ज़दारों की इमदाद करे। अपने नफ़्स को हुक़ूक़ की अदायगी और मसाएब पर आमादा करे के इसमें सवाब की उम्मीद पाई जाती है और उन तमाम ख़सलतों के हासिल करने ही में दुनिया की शराफ़तें और करामतें हैं और उन्हीं से आखि़रत के फ़ज़ाएल भी हासिल होते हैं। (इन्षाअल्लाह)

(((-अगर यह बात सही और यक़ीनन सही है के माल वही बेहतर होता है जिसका माल और अन्जाम बेहतर होता है तो हर शख़्स का फ़र्ज़ है के अपने माल को उन्हें मवारिद में सर्फ़ करे जिसकी तरफ इस ख़ुत्बे में इषारा किया गया है वरना बेमहल सर्फ़ से जाहिलों और बदकिरदारों की तारीफ़ के अलावा कुछ हाथ आने वाला नहीं है और इसमें न ख़ैरे दुनिया है और न ख़ैरे आखि़रत। बल्कि दुनिया और आखि़रत दोनों की तबाही और बरबादी का सबब है। परवरदिगार हर शख़्स को इस जेहालत और रियाकारी से महफ़ूज़ रखे-)))

143 आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (तलबे बारिष के सिलसिले में)

याद रखो के जो ज़मीन तुम्हारा बोझ उठाए हुए है और जो आसमान तुम्हारे सर पर सायाफ़िगाँ है दोनों तुम्हारे रब के इताअतगुज़ार हैं और यह जो अपनी बरकतें तुम्हें अता कर रहे हैं तो उनका दिल तुम्हारे हाल पर नहीं कुढ़ रहा है।

और न यह तुमसे तक़र्रब चाहते हैं और न किसी ख़ैर के उम्मीदवार हैं। बात सिर्फ़ यह है के उन्हें तुम्हारे फ़ायदों के बारे में हुक्म दिया गया है तो यह इताअते परवरदिगार कर रहे हैं और उन्हें तुम्हारे मसालेह के हुदूद पर खड़ा कर दिया गया है तो खड़े हुए हैं।

याद रखो के अल्लाह बदआमालियों के मौक़े पर अपने बन्दों को उन मसाएब में मुब्तिला कर देता है के फल कम हो जाते हैं, बरकतें रूक जाती हैं, ख़ैरात के ख़ज़ानों के मुंह बन्द हो जाते हैं ताके तौबा करने वाला तौबा कर ले और बाज़ आ जाने वाला बाज़ आ जाए। नसीहत हासिल करने वाला नसीहत हासिल कर ले और गुनाहों से रूकने वाला रूक जाए। परवरदिगार ने अस्तग़फ़ार को रिज़्क़ के नुज़ूल और मख़लूक़ात पर रहमत के विरूद का ज़रिया क़रार दे दिया है। उसका इरषादे गिरामी है के ‘‘अपने रब से अस्तग़फ़ार करो के वह बहुत ज़्यादा बख़्षने वाला है। वह अस्तग़फ़ार के नतीजे में तुम पर मूसलाधार पानी बरसाएगा। तुम्हारी अमवाल और औलाद के ज़रिये मदद करेगा, तुम्हारे लिये बाग़ात और नहरें क़रार देगा।’’ अल्लाह उस बन्दे पर रहम करे जो तौबा की तरफ़ मुतवज्जे हो जाए, ख़ताओं से माफ़ी मांगे और मौत से पहले नेक आमाल कर ले।

ख़ुदाया हम परदों के पीछे और मकानात के गोषों से तेरी तरफ़ निकल पड़े हैं, हमारे बच्चे और जानवर सब फ़रयादी हैं। हम तेरी रहमत की ख़्वाहिष रखते हैं। तेरी नेमत के उम्मीदवार हैं और तेरे अज़ाब और ग़ज़ब से ख़ौफ़ज़दा हैं। ख़ुदाया हमें बाराने रहमत से सेराब कर दे और हमें मायूस बन्दों में क़रार न देना और न क़हत से हलाक कर देना और न हमसे उन आमाल का मुहासेबा करना जो हमारे जाहिलों ने अन्जाम दिये हैं। ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले!
ख़ुदाया हम तेरी तरफ़ उन हालात की फ़रयाद लेकर आए हैं जो तुझसे मख़फ़ी नहीं हैं और उस वक़्त निकले हैं जब हमें सख़्त तंगियों ने मजबूर कर दिया है और क़हत सालियों ने बेबस बना दिया है और शदीद हाजत मन्दियों ने लाचार कर दिया है और दुष्वारियों व फ़ित्नों ने ताबड़तोड़ हमले कर रखे हैं। ख़ुदाया हमारी इल्तेमास यह है के हमें महरूम वापस न करना और हमें नामुराद न पलटाना। हमसे हमारे गुनाहों की बात न करना और हमारे आमाल का मुहासेबा न करना बल्के हम पर अपनी बारिष रहमत, अपनी बरकत, अपने रिज़्क़ और करम का दामन फैला दे और हमें ऐसी सेराबी अता फ़रमा जो तष्नगी को मिटाने वाली, सेर व सेराब करने वाली और सब्ज़ा उगाने वाली हो ताके जो खेतियां गई गुज़री हो गई हैं दोबारा उग आएं और जो ज़मीनें मुर्दा हो गई हैं वह ज़िन्दा हो जाएं। यह सेदाबी फ़ायदेमन्द और बेपनाह फलों वाली हो जिससे हमवार ज़मीनें सेराब हो जाएं और वादियां बह निकलें। दरख़्तों में पत्ते निकल आएं और बाज़ारी की क़ीमतें नीचे आ जाएं के तू हर शै पर क़ादिर है।

144-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें बअसत अम्बिया का तज़किरा किया गया है)

परवरदिगार ने मुरसेलीन कराम को मख़सूस वही से नवाज़ कर भेजा है और उन्हें अपने बन्दों पर अपनी हुज्जत बना दिया है ताके बन्दों की यह हुज्जत तमाम न होने पाए के उनके उज़्र का ख़ातेमा नहीं किया गया है। परवरदिगार ने इन लोगों को इसी लिसाने सिद्क़ के ज़रिये राहे हक़ की तरफ़ दावत दी है। इसे मख़लूक़ात का हाल मुकम्मल तौर से मालूम है वह न उनके छिपे हुए इसरार से बेख़बर है और न पोषीदा बातों से नावाक़िफ़ है जो उनके दिलों के अन्दर मख़फ़ी है। वह अपने एहकाम के ज़रिये इनका इम्तेहान लेना चाहता है के हुस्ने अमल के एतबार से कौन सबसे बेहतर है ताके जज़ा में सवाब अता करे और पादाष में मुब्तिलाए अज़ाब कर दे।

(अहलेबैत अलैहिस्सलाम) कहाँ हैं वह लोग जिनका ख़याल यह है के हमारे बजाय वही रासख़्ूान फ़िल इल्म हैं और यह ख़याल सिर्फ़ झूट और हमारे खि़लाफ़ बग़ावत से पैदा हुआ है के ख़ुदा ने हमें बलन्द बना दिया है और उन्हें पस्त रखा है। हमें कमालात इनायत फ़रमा दिये हैं और उन्हें महरूम रखा है। हमेंं अपनी रहमत में दाखि़ल कर दिया है और उन्हें बाहर रखा है। हमारे ही ज़रिये से हिदायत तलब की जाती है और अन्धेरों में रोषनी हासिल की जाती है। याद रखो क़ुरैष के सारे इमाम जनबा हाषिम की इसी किष्ते ज़ार में क़रार दिये गए हैं और यह अमानत न उनके अलावा किसी को ज़ेब देती है और न उनसे बाहर कोई इसका अहल हो सकता है।

(गुमराह लोग) इन लोगों ने हाज़िर दुनिया को इख़्तेयार कर लिया है और देर में आने वाली आख़ेरत को पीछे हटा दिया है। साफ़ पानी को नज़रअन्दाज़ कर दिया है और गन्दा पानी को पी लिया है। गोया के मैं उनके फ़ासिक़ को देख रहा हूँ जो मुनकिरात से मानूस हैं और बुराइयों से हमरंग व हमआहंग हो गया है, यहांतक के इसी माहौल में इसके सारे बाल सफ़ेद हो गए हैं और इसी रंग में इसके एख़लाक़ियात रंग गए हैं। इसके बाद एक सेलाब की तरह उठा है जिसे इसकी फ़िक्र नहीं है के इसको डुबो दिया है और भूसे की एक आग है जिसे इसकी परवाह नहीं है के क्या जला दिया है।

क्हां हैं वह अक़्लें जो हिदायत के चराग़ों से रोषनी हासिल करने वाली हैं और कहां हैं वह निगाहें जो मिनारए तक़वा की तरफ़ नज़र करने वाली हैं, कहां हैं वह दिल जो अल्लाह के लिये दिये गये हैं और इताअते ख़ुदा पर जम गए हैं। लोग तो माले दुनिया पर टूट पड़े हैं और हराम पर बाक़ायदा झगड़ा कर रहे हैं और जब जन्नत व जहन्नम का परचम बलन्द किया गया तो जन्नत की तरफ़ से मुँह को “ौतान ने दावत दी तो लब्बैक कहते हुए आ गए।

145- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (दुनिया की फ़ना के बारे में)

लोगों! तुम उस दुनिया में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हो जहाँ मौत के तीरों के मुस्तक़िल हदफ़ हो। यहाँ हर घूंट के साथ उच्छू है और हर लुक़्मे के साथ गले का फ़न्दा। यहाँ कोई नेमत उस वक़्त तक नहीं मिलती है जब तक दूसरी हाथ से निकल न जाए और यहाँ की ज़िन्दगी में एक दिन का भी इज़ाफ़ा नहीं होता है जब तक एक दिन कम न हो जाए। यहाँ के खाने में ज़्यादती भी पहले रिज़्क़ के ख़ात्मे के बाद हाथ आती है और कोई असर भी पहले निषान के मिट जाने के बाद ही ज़िन्दा होता है। हर जदीद के लिये एक जदीद को क़दीम बनना पड़ता है और हर घास के उगने के लिये एक खेत को काटना पड़ता है। पुराने बुज़ुर्ग जो हमारी असल थे गुज़र गए अब हम उनकी शाख़ें हैं और खुली हुई बात है के असल के चले जाने के बाद फ़ुरूअ की बक़ा ही क्या होती है।
(मज़म्मते बिदअत) कोई बिदअत उस वक़्त तक ईजाद नहीं होती है जब तक कोई सुन्नत मर न जाए। लेहाज़ा बिदअतों से डरो और सीधे रास्ते पर क़ायम रहो के मुस्तहकमतरीन मुआमलात ही बेहतर होते हैं और दीन में जदीद ईजादात ही बदतरीन शै होती हैं।

146-आपका इरषादे गिरामी (जब अम्र बिन ख़त्ताब ने फ़ारस की जंग में जाने के बारे में मष्विरा तलब किया)

याद रखो के इस्लाम की कामयाबी और नाकामयाबी का दारोमदार क़िल्लत व कसरत पर नहीं है बल्कि यह दीन, दीने ख़ुदा है जिसे उसी ने ग़ालिब बनाया है और यह उसी का लष्कर है जिसे उसी ने तैयार किया है और उसी ने इसकी इमदाद की है यहाँतक के इस मन्ज़िल तक पहुँच गया है और इस क़द्र फैलाव हासिल कर लिया है। हम परवरदिगार की तरफ़ से एक वादा पर हैं और वह अपने वादे को बहरहाल पूरा करने वाला है और अपने लष्कर की बहरहाल मदद करेगा।
मुल्क में निगराँ की मंिन्ज़ल महरों के इज्तेमाअ में धागे की होती है के वही सबको जमा किये रहता है और वह अगर टूट जाए तो सारा सिलसिला बिखर जाता है और फिर कभी भी जमा नहीं हो सकता है। आज अरब अगरचे क़लील हैं लेकिन इस्लाम की बिना पर कसीर हैं और अपने इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ की बिना पर ग़ालिब आने वाले हैं। लेहाज़ा आप मरकज़ीन में रहें और इस चक्की को उन्हीं के ज़रिये गर्दिष दें और जंग की आग का मुक़ाबला उन्हीं को करने दें आप ज़हमत न करें के अगर आपने इस सरज़मीन को छोड़ दिया तो अरब चारों तरफ़ से टूट पड़ेंगे और सब इसी तरह शरीके जंग हो जाएंगे के जिन महफ़ूज़ मुक़ामात को आप छोड़कर गए हैं उनका मसला जंग से ज़्यादा अहम हो जाएगा।

इन अजमों ने अगर आपको मैदाने जंग में देख लिया तो कहेंगे के अरबीयत की जान यही है इस जड़ को काट दिया तो हमेषा हमेषा के लिये राहत मिल जाएगी और इस तरह उनके हमले शदीदतर हो जाएंगे और वह आपमें ज़्यादा ही तमअ करेंगे और यह जो आपने ज़िक्र किया है के लोग मुसलमानों से जंग करने के लिये आ रहे हैं तो यह बात ख़ुदा को आपसे ज़्यादा नागवार है और वह जिस चीज़ को नागवार समझता है उसके बदल देने पर क़ादिर भी है। और यह जो आपने दुष्मन के अदद का ज़िक्र किया है तो याद रखो के हम लोग माज़ी में भी कसरत की बिना पर जंग नहीं करते थे बल्कि परवरदिगार की नुसरत और इआनत की बुनियाद पर जंग करते थे।

147- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

परवरदिगारे आलम ने हज़रत मोहम्मद (स0) को हक़ के साथ मबऊस किया ताके आप लोगों को बुत परस्ती से निकाल कर इबादते इलाही की मन्ज़िल की तरफ़ ले आएँ और “ौतान की इताअत से निकाल कर रहमान की इताअत कराएं। इस क़ुरान के ज़रिये जिसे उसने वाज़ेअ और मोहकम क़रार दिया है ताके बन्दे ख़ुदा को नहीं पहचानते हैं तो पहचान लेँ और उसके मुन्किर हैं तो इक़रार कर लें और हठधर्मी के बाद उसे मान लें। परवरदिगार अपनी क़ुदरते कामेला की निषानियों के ज़रिये बग़ैर देखे जलवा नुमाँ है और अपनी सुतूत के ज़रिये उन्हें ख़ौफ़ज़्ादा बनाए हुए हैं के किस तरह उसने उक़ूबतों के ज़रिये उसके मुस्तहक़ीन को तबाह व बरबाद कर दिया है और अज़ाब के ज़रिये उन्हें तहस-नहस कर दिया है।

याद रखो- मेरे बाद तुम्हारे सामने वह ज़माना आने वाला है जिसमें कोई “ौ हक़ से ज़्यादा पोषीदा और बातिल से ज़्यादा नुमायाँ न होगी। सबसे ज़्यादा रिवाज ख़ुदा और रसूल पर इफ़तरा का होगा और उस ज़माने वालों के नज़दीक किताबे ख़ुदा से ज़्यादा बेक़ीमत कोई क़िताअ न होगी अगर इसकी वाक़ेई तिलवात की जाए और इससे ज़्यादा कोई फ़ायदेमन्द बज़ाअत न होगी अगर इसके मफ़ाहिम को उनकी जगह से हटा दिया जाए। शहरों में ‘‘मुन्किर’’ से ज़्यादा मारूफ़ और ‘‘मारूफ़’’ से ज़्यादा मुन्किर कुछ न होगा। हामेलाने किताब को छोड़ देंगे और हाफ़िज़ाने क़ुरान क़ुरान को भुला देंगे। किताब और उसके वाक़ेई अहल शहर बदर कर दिये जाएंगे और दोनों एक ही रास्ते पर इस तरह चलेंगे के कोई पनाह देने वाला न होगा। किताब और अहले किताब इस दौर में लोगों के दरम्यान रहेंगे लेकिन वाक़ेअन न रहेंगे। उन्हीं के साथ रहेंगे लेकिन हक़ीक़तन अलग रहेंगे। इसलिये के गुमराही हिदायत के साथ नहीं चल सकती है चाहे एक ही मक़ाम पर रहे। लोगों ने इफ़्तेराक़ पर इत्तेहाद और इत्तेहाद पर इफ़तेराक़ कर लिया है जैसे यही क़ुरान के पेषवा हैं और क़ुरान उनका पेषवा नहीं है। अब उनके पास सिर्फ़ क़ुरान का नाम बाक़ी रह गया है और वह सिर्फ़ उसकी किताबत व इबारत को पहचानते हैं और बस! इसके पहले भी यह नेक किरदारों को बेहद आज़ियत कर चुके हैं और इनकी सिदाक़त को इफ़तेरा का नाम दे चुके हैं उन्हें नेकियों पर बुराइयों की सज़ा दे चुके हैं।
तुम्हारे पहले वाले सिर्फ़ इसलिये हलाक हो गये के उनकी उम्मीदें दराज़ थीं और मौत उनकी निगाहों से ओझल थी यहाँतक के वह मौत नाज़िल हो गई जिसके बाद माज़रत वापस कर दी जाती है और तौबा की मोहलत उठा ली जाती है और मुसीबत व अज़ाब का वुरूद हो जाता है।
अय्योहन्नास! जे परवरदिगार से वाक़ेअन नसीहत हासिल करना चाहता है उसे तौफ़ीक़ नसीब हो जाती है और जो उसके क़ौल को वाक़ेअन राहनुमा बनाना चाहता है उसे सीधे रास्ते की हिदायत मिल जाती है। इसलिये के परवरदिगार का हमसाया हमेषा अम्नो अमान में रहता है और उसका दुष्मन हमेषा ख़ौफ़ज़दा रहता है। याद रखो जिसने अज़मते ख़ुदा को पहचान लिया है उसे बड़ाई ज़ेब नहीं देती है के ऐसे लोगों की रफ़अत व बलन्दी तवाज़अ और ख़ाकसारी ही में है और इसकी क़ुदरत के पहचानने वालों की सलामती उसके सामने सरे तस्लीम ख़म कर देने ही में है। ख़बरदार हक़ से इस तरह न भागो जिस तरह सही व सालिम ख़ारिषज़दा से, या सेहत याफ़्ता बीमार से फ़रार करता है। याद रखो तुम हिदायत को उस वक़्त तक नहीं पहचान सकते हो जब तक उसे छोड़ने वालों को न पहचान लो और किताबे ख़ुदा के अहद व पैमान को उस वक़्त तक इख़्तेयार नहीं कर सकते हो जब तक उसके तोड़ने वालों की मारेफ़त हासिल न कर लो और उसे तमस्सुक उस वक़्त तक मुमकिन नहीं है जब तक उसे नज़र अन्दाज़ करने वालों का इरफ़ान हो जाए। हक़ को उसके अहल के पास तलाष करो के यही लोग इल्म की ज़िन्दगी और जेहालत की मौत हैं। यही लोग वह हैं जिनका हुक्म उनके इल्म का और उनकी ख़ामोषी उनके तकल्लुम का और उनका ज़ाहिर उनके बातिन का पता देता है। यह लोग दीन की मुख़ालफ़त नहीं करते हैं और न उसके बारे में आपस में इख़्तेलाफ़ करते हैं दीन उनके दरम्यान बेहतरीन सच्चा गवाह और ख़ामोष बोलने वाला है।

(((-यह हर दौर का ख़ासेरा है और सरकारे दो आलम (स0) के बाद बनी उमय्या ने तो इस इफ़तरा का बाज़ार इस तरह गर्म किया था के बाद के मोहद्देसीन को लाखों हदीसों के ज़ख़ीरे में से चन्द हज़ार के अलावा कोई हदीस सही नज़र न आई और उनमें भी बाज़ हदीसें दूसरे ओलमा की नज़र में मषकूक रह गईं।
ख़ुदा व रसूल (स0) पर इफ़तरा के एतबार से ज़मानों को तक़सीम किया जाए तो शायद आज का दौर सद्रे इस्लाम से बेहतर ही नज़र आएगा के इस बदअमली की कसरत के बावजूद इस तरह की बेदीनी का रिवाज यक़ीनन कम हो गया है और अब मुसलमान इस क़िस्म की रिवायत साज़ी को पसन्द नहीं करते हैं अगरचे बदक़िस्मती से जाली रिवायात पर अमल कर रहे हैं-)))

148-आपका इरषादे गिरामी (अहले बसरा (तल्हा व ज़ुबैर) के बारे में)

यह दोनों अम्रे खि़लाफ़त के अपनी ही ज़ात के लिये उम्मीदवार हैं और उसे अपनी ही तरफ़ मोड़ना चाहते हैं। इनका अल्लाह के किसी वसीले से राबेता और किसी ज़रिये से ताअल्लुक़ नहीं है। हर एक दूसरे के हक़ में कीना रखता है और अनक़रीब इसका परदा उठ जाएगा। ख़ुदा की क़सम अगर उन्होंने अपने मुद्दआ को हासिल कर लिया तो एक दूसरे की जान लेकर छोड़ेंगे और इसकी ज़िन्दगी का ख़ात्मा कर देंगे। देखो बाग़ी गिरोह उठ खड़ा हुआ है। तो राहे ख़ुदा में काम करने वाले कहाँ चले गए जबके उनके लिये रास्ते मुक़र्रर कर दिये गए हैं और उन्हें इसकी इत्तेलाअ दी जा चुकी है? मैं जानता हूँ के हर गुमराही का एक सबब होता है और हर अहद षिकन एक शुबह ढूंढ लेता है लेकिन मैं उस शख़्स के मानिन्द नहीं हो सकता हूँ जो मातम की आवाज़ सुनता है। मौत की सनानी कानों तक आती है। लोगों का गिरया देखता है और फिर इबरत हासिल नहीं करता है।

149- आपका इरषादे गिरामी (अपनी शहादत से क़ब्ल)

लेगों! देखो हर शख़्स जिस वक़्त से फ़रार कर रहा है उससे बहरहाल मुलाक़ात करने वाला है और मौत ही हर नफ़्स की आखि़री मन्ज़िल है और उससे भागना ही उसे पा लेना है। ज़माना गुज़र गया जबसे मैं इस राज़ की जुस्तजू में हूँ लेकिन परवरदिगार मौत के इसरार को परदए राज़ ही में रखना चाहता है। यह एक इल्म है जो ख़ज़ानए क़ुदरत में महफ़ूज़ है। अलबत्ता मेरी वसीअत यह है के किसी को अल्लाह का शरीक न क़रार देना और पैग़म्बरे अकरम (स0) को ज़ाया न कर देना के यही दोनों दीन के सुतून हैं उन्हीं को क़ायम करो और उन्हीं दोनों चिराग़ों को रोषन रखो। इसके बाद अगर तुम मुन्तषिर नहीं होगे तो तुम पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। हर शख़्स अपनी ताक़त भर बोझ का ज़िम्मेदार बनाया गया है और जाहिलों का बोझ हल्का रखा गया है के परवरदिगार रहीम व करीम है और दीन मुस्तहकम है और राहनुमा भी अलीम व दाना है। मैं कल तुम्हारे साथ था और आज तुम्हारे लिये मन्ज़िले इबरत मैं हूँ और कल तुमसे जुदा हो जाऊंगा, अल्लाह तुम्हें और मुझे दोनों को माफ़ कर दे।

देखो! इस मन्ज़िले लग़्िज़ष में अगर साबित रह गए तो क्या कहना। वरना अगर क़दम फिसल गए तो याद रखना के हम भी उन्हीं शाख़ों की छावें, उन्हीं हवाओं की गुज़रगाह और उन्हीं बादलों के साये में थे लेकिन इन बादलों के टुकड़े फ़िज़ा में मुन्तषिर हो गए और इन हवाओं के निषानात ज़मीन से महो हो गए।

(((- इसमें कोई शक नहीं है के मुसलमानों ने खि़लाफ़त का झगड़ा दफ़ने पैग़म्बर (स0) से पहले ही शुरू कर दिया था और फिर उसे मुसलसल जारी रखा और मुख़्तलिफ़ अन्दाज़ से जोड़-तोड़ के ज़रिये खि़लाफ़तों का फ़ैसला होता रहा लेकिन किसी दौर में भी खि़लाफ़त के फ़ैसले के लिये तलवार और जंग का सहारा नहीं लिया गया। यह बिदअत सिर्फ़ हज़रत उम्मुलमोमेनीन की ईजाद है के उन्होंने तल्हा व ज़ुबैर की खि़लाफ़त के लिये तलवार का भी सहारा ले लिया और फिर माविया के लिये ज़मीन हमवार कर दी और उसके नतीजे में खि़लाफ़त का फ़ैसला जंग व जेदाल से शुरू हो गया और इस राह में बेषुमार जानें ज़ाया होती रहीं।

अफ़सोस के जंगे हमल और सिफ़फ़ीन में तौ शुबे की भी कोई गुन्जाइष नहीं थी, हज़रत आइषा, तल्हा, ज़ुबैर, माविया, अम्र व आस कोेई ऐसा नहीं था जो हज़रत अली (अ0) की शख़्िसयत और उनके बारे में इरषादाते पैग़म्बर (स0) से बाख़बर न हो। इसके बाद शुबह या ख़ताए इज्तेहादी का नाम देकर अवामुन्नास को तो धोका दिया जा सकता है, दावरे महषर को धोका नहीं दिया जा सकता है।-)))

मैं कल तुम्हारे हमसाये में रहा, मेरा बदन एक अरसे तक तुम्हारे दरम्यान रहा और अनक़रीब तुम उसे जसे बिला रूह की शक्ल में देखोगे जो हरकत के बाद साकिन हो जाएगा और तकल्लुम के बाद साकित हो जाएगा। अब तो तुम्हें इस ख़ामोषी, इस सुकूत और इस सुकून से नसीहत हासिल करनी चाहिए के यह साहेबाने इबरत के लिये बेहतरीन मुक़र्रर और क़ाबिले समाअत बयानात से ज़्यादा बेहतर नसीहत करने वाले हैं। मेरी तुमसे जुदाई इस शख़्स की जुदाई है जो मुलाक़ात के इन्तेज़ार में है। कल तुम मेरे ज़माने को पहचानोगे और तुम पर मेरे इसरार मुन्कषिफ होंगे और तुम मेरी सही मारेफ़त हासिल करोगे जब मेरी जगह ख़ाली हो जाएगी और दूसरे लोग इस मन्ज़िल पर क़ाबिज़ हो जाएंगे।

150- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें ज़माने के हवादिस की तरफ़ इषारा किया गया है और गुमराहों के एक गिरोह का तज़किरा किया गया है)

डन लोगों ने गुमराही के रास्तों पर चलने और हिदायत के रास्तों को छोड़ने के लिये दाहिने बायें रास्ते इख़्तेयार कर लिये हैं मगर तुम इस अम्र में जल्दी न करो जो बहरहाल होने वाला है और जिसका इन्तेज़ार किया जा रहा है और उसे दूर न समझो जो कल सामने आने वाला है के कितने ही जल्दी के तलबगार जब मक़सद को पा लेते हैं तो सोचते हैं के काष उसे हासिल न करते, आज का दिन कल के सवेरे से किस क़द्र क़रीब है।
लोगों! यह हर वादे के वुरूद और हर उस चीज़ के ज़हूर की क़ुरबत का वक़्त है जिसे तुम नहीं पहचानते हो लेहाज़ा जो शख़्स भी इन हालात तक बाक़ी रह जाए उसका फ़र्ज़ है के रौषन चिराग़ के सहारे क़दम आगे बढ़ाए और स्वालेहीन के नक़्षे क़दम पर चले ताके हर गिरह को खोल सके और हर ग़ुलामी से आज़ादी पैदा कर सके, हर मुज्तमा को बवक़्ते ज़रूरत मुन्तषिर कर सके और हर इन्तेषार को मुज्तमा कर सके और लोगों से यूँ मख़फ़ी रहे के क़या़फ़ाषिनास भी उसके नक़्षे क़दम को ताहद्दे नज़र न पा सकें। उसके बाद एक क़ौम पर इस तरह सैक़ल की जाएगी जिस तरह लोहार तलवार की धार पर सैक़ल करता है। इन लोगों की आंखों को क़ुरआन के ज़रिये रौषन किया जाएगा और उनके कानों में तफ़सीर को मुसलसल पहुंचाया जाएगा और उन्हें सुब्ह व शाम हुकुमत के जामों से सेराब किया जाएगा। 

इन गुमराहों को मोहलत दी गई ताके अपनी रूसवाई को मुकम्मल कर लें और हर तग़य्युर के हक़दार हो जाएं। यहाँ तक के जब ज़माना काफ़ी गुज़र चुका और एक क़ौम फ़ित्नों से मानूस हो चुकी और जंग की तख़हम पाषियों के लिये खड़ी हो गई, तो वह लोग भी सामने आ गए जो अल्लाह पर अपने सब्र का एहसान नहीं जताते और राहे ख़ुदा में जान देने को कोई कारनामा नहीं तसव्वुर करते, यहाँ तक के जब आने वाले हुक्म क़ज़ाने आज़्माइष की मुद्दत को तमाम कर दिया।

(((-अमीरूल (अ0) ने अपने बाद पैदा होने वाले फ़ित्नों की तरफ़ भी इषारा किया है और इस नुक्ते की तरफ़ भी मुतवज्जो किया है के ज़माना बहरहाल हुज्जते ख़ुदा से ख़ाली न रहेगा। और इस अन्धेरे में भी कोई न कोई सिराज मुनीर ज़रूर रहेगा लेहाज़ा तुम्हारा फ़र्ज़ है के इसका सहारा लेकर आगे बढ़ो और बेहतरीन नताएज हासिल कर लो। इसका बेहतरीन दौर इमाम बाक़र (अ0) और इमाम सादिक़ (अ0) का दौर है जहाँ चार हज़ार असहाबे फ़िक्र व नज़र इमाम (अ0) के मदरसे में हाज़री दे रहे थे और आपके तालीमात से अपने दिल व दिमाग़ को रौषन कर रहे थे। कानों में क़ुरान सामित की आवाज़े थी और निगाहों में क़ुराने नातिक़ का जलवा-)))

तो इन्होंने अपनी बसीरत को अपनी तलवारों पर मुसल्लत कर दिया और अपने नसीहत करने वाले के हुक्म से परवरदिगार की बारगाह में झुक गए। मगर इसके बाद जब परवरदिगार ने पैग़म्बरे अकरम (स0) को अपने पास बुला लिया तो एक क़ौम उलटे पांव पलट गई और उसे मुख़तलिफ़ रास्तों ने तबाह कर दिया। उन्होंने महमिले अक़ायद का सहारा लिया और ग़ैर क़राबतदार से ताल्लुक़ात पैदा किये और इस सबब को नज़रअन्दाज़ कर दिया जिससे मवद्दत का हुक्म दिया गया था। इमारत को जड़ से उखाड़ कर दूसरी जगह पर क़ायम कर दिया जो हर ग़लती का मोअद्दन व मख़ज़न है और हर गुमराही का दरवाज़ा थे, हैरत में सरगर्दां और आले फ़िरऔन की तरह नषे में ग़ाफ़िल थे इनमें कोई दुनिया की तरफ़ मुकम्मल कट कर आ गया था और कोई दीन से मुस्तक़िल तरीक़े पर अलग हो गया था।