True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

92- आपका इरषादे गिरामी (जब लोगों ने क़त्ले उस्मान के बाद आपकी बैअत का इरादा किया)

मुझे छोड़ दो और जाओ किसी और को तलाष कर लो। हमारे सामने वह मामला है जिसके बहुत से रंग और रूख़ हैं जिनकी न दिलों में ताब है और न अक़्लें उन्हें बरदाष्त कर सकती हैं। देखो उफ़क़ किस क़दर अब्र आलूद है और रास्ते किस क़द्र अन्जाने हो गए हैं। याद रखो के अगर मैंने बैअत की दावत को क़ुबूल कर लिया तो तुम्हें अपने इल्म ही के रास्ते पर चलाऊंगा और किसी की कोई बात या सरज़न्ष नहीं सुनूंगा। लेकिन अगर तुमने मुझे छोड़ दिया तो तुम्हारी ही एक फ़र्द की तरह ज़िन्दगी गुज़ारूंगा बल्के शायद तुम सबसे ज़्यादा तुम्हारे हाकिम के एहकाम का ख़याल रखूं। मैं तुम्हारे लिये वज़ीर की हैसियत से अमीर की बनिस्बत ज़्यादा बेहतर रहूँगा।

((( अमीरूल मोमेनीन (अ0) के इस इरषाद से तीन बातों की मुकम्मल वज़ाहत हो जाती है।

1. आपको खि़लाफ़त की कोई हिरस और तमाअ नहीं थी और न आप उसके लिये किसी तरह की दौड़ धूप के क़ायल थे ओहदाए इलाही ओहदेदार के पास आता है, ओहदेदार उसकी तलाष में नहीं निकलता है।

2. आप किसी क़ीमत पर इस्लाम की तबाही बरदाष्त नहीं कर सकते थे। आपकी निगाह में खि़लाफ़त के जुमला मुष्किलात व मसाएब थे और क़ौम की तरफ़ से बग़ावत का ख़तरा निगाह के सामने था लेकिन उसके बावजूद अगर मिल्लत की इस्लाह और इस्लाम की बक़ा का दारोमदार इसी खि़लाफ़त के क़ुबूल करने पर है तो आप इस राह में हर तरह की क़ुरबानी देने के लिये तैयार हैं।

3. आपकी नज़र में उम्मत के लिये एक दरम्यानी रास्ता वही था जिस पर आज तक चल रही थी के अपनी मर्ज़ी से कोई अमीर तय कर ले और फिर वक़्तन फ़वक़्तन आपसे मष्विरा करती रहे के आप मष्विरा देने से बहरहाल गुरेज़ नहीं करते हैं जिसका मुसलसल तजुरबा हो चुका है और इसी अम्र को आपने ज़रारत से ताबीर किया है। वरना जिसको हुकूमत की इमारत नाक़ाबिले क़ुबूल हो उसकी वज़ारत उससे ज़्यादा बदतर होगी। विज़ारत फ़क़त इस्लामी मफ़ादात की हद तक बोझ बटाने की हसीन तरीन ताबीर है।)))

93- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें आपने अपने इल्म व फ़ज़्ल से आगाह करते हुए बनी उमय्या के फ़ित्ने की तरफ़ मुतवज्जो किया है।)

हम्द व सनाए परवरदिगार के बाद- लोगों! याद रखो मैंने फ़ित्ने की आंख को फोड़ दिया है और यह काम मेरे अलावा कोई दूसरा अन्जाम नहीं दे सकता है जबके इसकी तारीकियां तहोबाला हो रही हैं और उसकी दीवानगी का मर्ज़ शदीद हो गया है। अब तुम मुझसे जो चाहो दरयाफ़त कर लो क़ब्ल इसके के मैं तुम्हारे दरम्यान न रह जाऊँ। उस परवरदिगार की क़सम जिसके क़ब्ज़ए क़ुदरत में मेरी जान है तुम अब से क़यामत तक के दरम्यान जिस चीज़ के बारे में सवाल करोगे और जिस गिरोह के बारे में दरयाफ़्त करोगे जो सौ अफ़राद को हिदायत दे और सौ को गुमराह कर दे तो मैं उसके ललकारने वाले, खींचने वाले, हंकान वाले, सवारियों के क़याम की मंज़िल, सामान उतारने की जगह, कौन इनमें से क़त्ल किया जाएग, कौन अपनी मौत से मरेगा। सब बता दूंगा। हालांके अगर यह बदतरीन हालात और सख़्त तरीन मुष्किलात मेरे बाद पेष आए तो दरयाफ़्त करने वाला भी परेषानी से सर झुका लेगा और जिससे दरयाफ़्त किया जाएगा वह भी बताने से आजिज़ रहेगा और यह सब उस वक़्त होगा जब तुम पर जंगें पूरी तैयारी के साथ टूट पड़ेंगी और दुनिया इस तरह तंग हो जाएगी के मुसीबत के दिन तुलानी महसूस होने लगेंगे। यहांतक के अल्लाह बाक़ीमान्दा नेक बन्दों को कामयाबी अता कर दे।

याद रखो फ़ितने जब आते हैं तो लोगों को शुबहात में डाल देते हैं और जब जाते हैं तो होषियार कर जाते हैं। यह आते वक़्त नहीं पहचाने जाते हैं लेकिन जब जाने लगते हैं तो पहचान लिये जाते हैं, हवाओं की तरह चक्कर लगाते रहते हैं। किसी शहर को अपनी ज़द में ले लेते हैं और किसी को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं। याद रखो। मेरी निगाह में सबसे ख़ौफ़नाक फ़ितना बनी उमय्या का है जो ख़ुद भी अन्धा होगा और दूसरों को भी अन्धेरे में रखेगा। उसके ख़ुतूत आम होंगे लेकिन इसकी बला ख़ास लोगों के लिये होगी जो इस फ़ित्ने में आंख खोले होंगे और न अन्धों के पास से बा आसानी गुज़र जाएगा
ख़ुदा की क़सम! तुम बनी उमय्या को मेरे बाद बदतरीन साहेबाने इक़तेदार पाओगे जिनकी मिसाल उस काटने वाली ऊंटनी की होगी जो मुंह से काटेगी और हाथ मारेगी या पांव चलाएगी और दूध न दूहने देगी और यह सिलसिला यूँ ही बरक़रार रहेगा जिससे सिर्फ़ वह अफ़राद बख़्षेंगे जो इनके हक़ में मुफ़ीद हों या कम से कम नुक़सानदेह न हों। यह मुसीबत तुम्हें इसी तरह घेरे रहेगी यहाँ तक के तुम्हारी दाद ख़्वाही ऐसे ही होगी जैसे ग़ुलाम अपने आक़ा से या मुरीद अपने पीर से इन्साफ़ का तक़ाज़ा करे।

((( पैग़म्बरे इस्लाम (स0) के इन्तेक़ाल के बाद जनाज़ाए रसूल (स0) को छोड़कर मुसलमानों की खि़लाफ़त साज़ी, खि़लाफ़त के बाद अमीरूल मोमेनीन (अ0) से मुतालेब-ए-बैयत, अबू सुफ़यान की तरफ़ से हिमायत की पेषकष, फ़िदक का ग़ासेबाना क़ब्ज़ा, दरवाज़े का जलाया जाना, फिर अबूबक्र की तरफ़ से उमर की नामज़दगी, फिर उमर की तरफ़ से शूरा के ज़रिये उस्मान की खि़लाफ़त, फिर तलहा व ज़ुबैर और आइषा की बग़ावत और फिर ख़वारिज का दीन से ख़ुरूज। यह वह फ़ित्ने थे जिनमें से कोई एक भी इस्लाम को तबाह कर देने के लिये काफ़ी था। अगर अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने मुकम्मल सब्र व तहम्मुल का मुज़ाहेरा न किया होता और सख़्त तरीन हालात पर सुकूत इख़्तेयार न फ़रमाया होता। इसी सुकूत और तहम्मुल को फ़ित्नों की आंख फोड़ देने से ताबीर किया गया है और इसके बाद इल्मी फ़ित्नों से बचने का एक रास्ता यह बता दिया गया है के जो जाहो दरयाफ़्त कर लो, मैं क़यामत तक के हालात से बाख़बर कर सकता हूँ। (रूहीलहल फ़िदाअ) )))

तुम पर इनका फ़ित्ना ऐसी भयानक शक्ल में वारिद होगा जिससे डर लगेगा और इसमें जाहेलीयत के अजज़ा होंगे, न कोई मिनारए हिदायत होगा और न कोई रास्ता दिखाने वाला परचम। बस हम अहलेबैत (अ0) हैं जो इस फ़ित्ने से महफ़ूज़ रहेंगे और इसके दाइयों में से न होंगे, इसके बाद अल्लाह तुमसे इस फ़ित्ने को इस तरह अलग कर देगा, जिस तरह जानवर की खाल उतारी जाती है। इस शख़्स के ज़रिये उन्हें ज़लील करेगा और सख़्ती से हंकाएगा और मौत के तल्ख़ घूंट पिलाएगा और तलवार के अलावा कुछ न देगा और ख़ौफ़ के अलावा कोई लिबास न पहनएगा। वह वक़्त होगा जब क़ुरैष को यह आरज़ू होगी के काष दुनिया और उसकी तमाम दौलत देकर एक मन्ज़िल पर मुझे देख लेते चाहे सिर्फ़ इतनी ही देर के लिये जितनी देर में एक ऊँट नहर किया जाता है ताके मैं उनसे इस चीज़ को क़ुबूल कर लूं जिसका एक हिस्सा आज मांगता हूँ तो वह देने के लिये तैयार नहीं हैं।

94- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जिसमें परवरदिगार के औसाफ़ - रसूले अकरम (स0) और अहलेबैत (अ0) अतहार के फ़ज़ाएल और मौअज़ए हसना का ज़िक्र किया गया है)

ब-बरकत है वह परवरदिगार जिसकी ज़ात तक हिम्मतों की बलन्दियां नहीं पहुँच सकती हैं और अक़्ल व फ़हम की ज़ेहानतें उसे नहीं पा सकती हैं। वह ऐसा अव्वल है जिसकी कोई आखि़री हद नहीं है और ऐसा आखि़र है जिसके लिये कोई फ़ना नहीं है। (अम्बियाए कराम) (अ0) परवरदिगार ने उन्हें बेहतरीन मुक़ामात परवरीयत रखा और बेहतरीन मन्ज़िल में मुस्तक़र किया। वह मुसलसल शरीफ़तरीन असलाब से पाकीज़ातरीन अरहाम की तरफ़ मुन्तक़िल होते रहे के जब कोई बुज़ुर्ग गुज़र गया तो दीने ख़ुदा की ज़िम्मेदारी बाद वाले ने संभाल ली। (रसूले अकरम (अ0)) यहां तक के इलाही शरफ़ हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स0) तक पहुंच गया और उसने उन्हें बेहतरीन नष्र व नुमा के मअदन और शरीफ़तरीन असल के मरकज़ के ज़रिये दुनिया में भेज दिया। इसी शजरए तय्यबा से जिस से अम्बिया को पैदा किया और अपने अमीनों का इन्तेख़ाब किया। पैग़म्बर (स0) की इतरत बेहतरीन और उनका ख़ानदान शरीफ़तरीन ख़ानदान है। इनका शजरा बेहतरीन शजरा है जो सरज़मीने हरम पर उगा है और बुज़ुर्गी के साये में परवान चढ़ा है। इसकी शाख़ें बहुत तवील हैं और इसके फल इन्सानी दस्तरस से बालातर हैं। वह अहले तक़वा के इमाम और हिदायत हासिल करने वालों के लिये सरचष्मए बसीरत हैं।

(((अमीरूल मोमेनीन (अ0) का यह इरषादे गिरामी इस बात की वाज़ेअ दलील है के अम्बियाए कराम के आबाओ अजदाद और उम्महात में कोई एक भी ईमान या किरदार के एतबार से नाक़िस और ऐबदार नहीं था और इसके बाद इस बहस की ज़रूरत नहीं रह जाती है के यह बात अक़्ली एतबार से ज़रूरी है या नहीं और उसके बग़ैर मन्सब का जवाज़ पैदा हो सकता है या नहीं? इसलिये के अगर काफ़िर अस्लाब और बेदीन अरहाम में कोई नुक़्स नहीं था और नापाक ज़र्फ़ मन्सबे इलाही के हामिल के लिये नामुनासिब नहीं था तो इस क़द्र एहतेमाम की क्या ज़रूरत थी के आदम (अ0) से लेकर ख़ातम तक किसी एक मरहले पर भी कोई नापाक या ग़ैर तय्यब रहम दाखि़ल न होने पाए।)))

ऐसा चिराग़ हैं जिसकी रोषनी लौ दे रही है और ऐसा रौषन सितारा हैं जिसका नूर दरख़्षा है और ऐसा चक़माक़ हैं जिसकी ज़ौ शोला फ़िषां है, उनकी सीरत (अफ़रात व तग़रीयत से बच कर) सीधी राह पर चलना और सुन्नत हिदायत करना है। इनका कलाम हक़ व बातिल का फ़ैसला करने वाला और हुक्म मुबीन अद्ल है। अल्लाह ने उन्हें उस वक़्त भेजा के जब रसूल की आमद का सिलसिला रूका हुआ था। बदअमली फैली हुई और उम्मतों पर ग़फ़लत छाई हुई थी। 
(मोअज़) देखो। ख़ुदा तुम पर रहमत नाज़िल करे। रौषन निषानियों पर जम कर अमल करो। रास्ता बिल्कुल सीधा है। वह तुम्हें सलामतीयों के घर (जन्नत) की तरफ़ बुला रहे हैं और अभी तुम ऐसे घर में हो के जहां तुम्हें इतनी मोहलत व फ़राग़त है के इसकी ख़ुषनूदियां हासिल कर सको, अभी मौक़ा है, चूंके आमालनामे खुले हुए हैं, क़लम चल रहे हैं, बदन सही व सालिम हैं, ज़बानें आज़ाद हैं, तौबा सुनी जा रही है और आमाल क़ुबूल किये जा रहे हैं।

 95- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें रसूले अकरम (स0) के फ़ज़ाएल व मनाक़िब का तज़किरा किया गया है।)

अल्लाह ने उन्हें उस वक़्त भेजा जब लोग गुमराही, हैरत व परेषानी में गुमकर्दा राह थे और फ़ितनों में हाथ पांव मार रहे थे। ख़्वाहिषात ने उन्हें बहका दिया और ग़ुरूर ने उनके क़दमों में लग़्िज़ष पैदा कर दी थी और भरपूर जाहलीयत ने उन्हें सुबक सर बना दिया था और वह ग़ैर यक़ीनी हालात और जिहालत की बलाओं की वजह से हैरान व परेषान थे। आपने नसीहत का हक़ अदा कर दिया, सीधे रास्ते पर चलने और लोगों को हिकमत और मोअज़ हसना की तरफ़ दावत दी।

96-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (हज़रत रब्बुल आलमीन और रसूले अकरम (स0) के सिफ़ात के बारे में)

तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जो ऐसा अव्वल है के उससे पहले कोई शय नहीं है और ऐसा आखि़र है के इसके बाद कोई शै नहीं है, वह ज़ाहिर है तो इससे माफ़ूक़ (बालातर) कुछ नहीं है और बातिन है तो इससे क़रीबतर कोई शय नहीं है। इसी ख़ुत्बे के ज़ैल में (रसूले अकरम (स0)) का ज़िक्र फ़रमाया। बुज़ुर्गी और शराफ़त के मादनों और पाकीज़गी की जगहों में इनका मुक़ाम बेहतरीन मुक़ाम और मरजियोम बेहतरीन मरज़ियोम है। उनकी तरफ़ नेक लोगों के दिल झुका दिये गए हैं और निगाहों के रूख़ मोड़ दिये गए हैं। ख़ुदा ने इनकी वजह से फ़ित्ने दबा दिये और (अदावतों के) शोले बुझा दिये भाइयों में उलफ़त पैदा की और जो (कुफ्ऱ में) इकट्ठे थे, उन्हें मुन्तषिर (अलहदा-अलहदा) कर दिया (इस्लाम की) पस्ती व ज़िल्लत को इज़्ज़त बख़्षी, और (कुफ्ऱ) की इज्ज़त व बुलन्दी को ज़लील कर दिया। इनका कलाम (षरीयत का) बयान और सुकूत (एहकाम की) ज़बान थी। 

(((ओलमाए उसूल की ज़बान में मासूम की ख़ामोषी तक़रीर से ताबीर किया जाता है और वह उसी तरह हुज्जत और मुदरक एहकाम है जिस तरह मासूम का क़ौल व अमल। वह सनद की हैसियत रखता है और उससे एहकामे शरीअत का इस्तनबात व इस्तख़राज किया जाता है। आम इन्सानों की ख़ामोषी दलीले रज़ामन्दी नहीं बन सकती है लेकिन मासूम की ख़ामोषी दलीले एहकाम भी बन जाती है।)))

97- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें अपने असहाब और असहाबे रसूले अकरम (स0) का मवाज़ाना किया गया है।)

अगर परवरदिगार ने ज़ालिम को मोहलत दे रखी है तो इसका मतलब यह नहीं है के वह उसकी गिरफ़्त से बाहर निकल गया है। यक़ीनन वह उसकी गुज़गाह और उसकी गरदन में उच्छू लगने की जगह पर उसकी ताक में है। क़सम है उस मालिक की जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है के यह क़ौम यक़ीनन तुम पर ग़ालिब आ जाएगी। न इसलिये के वह तुमसे ज़्यादा हक़दार हैं बल्कि इसलिये के वह अपने अमीर के बातिल की फ़ौरन इताअत कर लेते हैं और तुम मेरे हक़ में हमेषा सुस्ती से काम लेते हो। तमाम दुनिया की क़ौमें अपने हुक्काम के ज़ुल्म से ख़ौफ़ज़दा हैं और मैं अपनी रेआया के ज़ुल्म से परेषान हूँ। मैंने तुम्हें जेहाद के लिये आमादा किया मगर तुम न उठे। मौअज़ सुनाया तो तुमने न सुना, अलल एलान और ख़ुफ़िया तरीक़े से दावत दी लेकिन तुमने लब्बैक न कही और नसीहत भी की तो उसे क़ुबूल न किया। तुम ऐसे हाज़िर हो जैसे ग़ायब और ऐसे इताअत गुज़ार हो जैसे मालिक। मैं तुम्हारे लिये हिकमत आमेज़ बातें करता हूँ और तुम बेज़ार हो जाते हो। बेहतरीन नसीहत करता हूँ और तुम भाग खड़े होते हो, बाग़ियों के जेहाद पर आमादा करता हूँ और अभी आखि़रे कलाम तक नहीं पहुँचने पाता हूं के तुम सबा की औलाद की तरह मुन्तषिर हो जाते हो। अपनी महफ़िलों की तरफ़ पलट जाते हो और एक दूसरे के धोके में मुब्तिला हो जाते हो। मैं सुबह के वक़्त तुम्हें सीधा करता हूँ और तुम शाम के वक़्त यूँ पलट कर आते हो जैसे कमान, तुम्हें सीधा करने वाला भी आजिज़ आ गया और तुम्हारी इस्लाह भी नामुमिकन हो गई।

ऐ वह क़ौम जिसके बदन हाज़िर हैं और अक़्लें ग़ायब, तुम्हारे ख़्वाहिषात गो-ना-गों हैं और तुम्हारे हुक्काम तुम्हारी बग़ावत में मुब्तिला हैं। तुम्हारा अमीर अल्लाह की इताअत करता है और तुम उसकी नाफ़रमानी करते हो और शाम का हाकिम अल्लाह की मासियत करता है और उसकी क़ौम उसकी इताअत करती है। ख़ुदा गवाह है के मुझे यह बात पसन्द है के वामिया मुझसे दिरहम व दीनार का सौदा करे के तुममें के दस लेकर अपना एक दे दे।
कूफ़े वालों! मैं तुम्हारी वजह से तीन तरह की शख़्िसयात और दो तरह की कैफ़ियात से दो-चार हू। तुम कान रखने वाले बहरे, ज़बान रखने वाले गूंगे और आंख रखने वाले अन्धे हो। तुम्हारी हालत यह है के न मैदाने जंग के सच्चे जवाँमर्द हो और न मुसीबतों में क़ाबिले एतमाद साथी। तुम्हारे हाथ ख़ाक में मिल जाएं, तुम उन ऊंटों जैसे हो जिनके चराने वाले गुम हो जाएं के जब एक तरफ़ से जमा किये जाएँ तो दूसरी तरफ़ से मुन्तषिर हो जाएं। ख़ुदा की क़सम, मैं अपने ख़याल के मुताबिक़ तुम्हें ऐसा देख रहा हूँ के जंग तेज़ हो गई और मैदाने कारज़ार गर्म हो गया तो तुम फ़रज़न्दे अबूतालिब से इस बेषर्मी के साथ अलग हो जाओगे जिस तरह कोई औरत बरहना हो जाती है, लेकिन बहरहाल मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ से दलीले रौषन रखता हूँ और पैग़म्बर (स0) के रास्ते पर चल रहा हूँ। मेरा रास्ता बिल्कुल रौषन है जिसे मैं बातिल के अन्धेरों में भी ढून्ढ लेता हूँ।

(((- ख़ुदा गवाह है के क़ाएद की तमाम क़ायदाना सलाहियतें बेकार होकर रह जाती हैं जब क़ौम इताअत के रास्ते से मुन्हरिफ़ हो जाती है और बग़ावत पर आमादा हो जाती है। इन्हेराफ़ भी अगर जेहालत की बिना पर होता है तो उसकी इस्लाह का इमकान रहता है, लेकिन माले ग़नीमत और रिष्वत का बाज़ार गर्म हो जाए और दौलते दीन की क़ीमत बनने लगे तो वहाँ एक सही और सॉलेह क़ाएद का फ़र्ज़ क़यादत अन्जाम देना तक़रीबन नामुमकिन होकर रह जाता है और उसे सुबह-व-षाम हालात की फ़रयाद ही करना पड़ती है ताके क़ौम पर हुज्जत तमाम कर दे और मालिक की बारगाह में अपना उज़्र पेष कर दे। -)))

(असहाबे रसूले अकरम (स0)) देखो, अहलेबैते (अ0) पैग़म्बर (स0) पर निगाह रखो और उन्हीं के रास्ते को इख़्तेयार करो, उन्हीं के नक़्षे क़दम पर चलते रहो के वह न तुम्हें हिदायत से बाहर ले जाएंगे और न हलाकत में पलट कर जाने देंगे। वह ठहर जाएं तो ठहर जाओ, उठ खड़े हों तो खड़े हो जाओ, ख़बरदार उनसे आगे न निकल जाना के गुमराह हो जाओ और पीछे भी न रह जाना के हलाक हो जाओ। मैंने अस्हाबे पैग़म्बर (स0) का दौर भी देखा है मगर अफ़सोस तुममें का एक भी उनका जैसा नहीं है। वह सुबह के वक़्त इस तरह उठते थे के बाल उलझे हुए, सर पर ख़ाक पड़ी हुई जबके रात सजदे और क़याम में गुज़ार चुके होते थे और कभी पेषानी ख़ाक पर रखते थे और कभी रूख़सार। क़यामत की याद में गोया अंगारों पर खड़े रहते थे और उनकी पेषानियों पर सजदों की वजह से बकरी के घुटने जैसे गट्टे होते थे, उनके सामने ख़ुदा का ज़िक्र आता था तो आँसू इस तरह बरस पड़ते थे के गरेबान तक तर हो जाता था और उनका जिस्म अज़ाब के ख़ौफ़ और सवाब की उम्मीद में इस तरह लरज़ता था जिस तरह सख़्त तरीन आंधी के दिन कोई दरख़्त।

98- आपका इरषादे गिरामी (जिसमें बनी उमय्या के मज़ालिम की तरफ़ इषारा किया गया है)

ख़ुदा की क़सम, यह यूँ ही ज़ुल्म करते रहेंगे यहां तक के कोई हराम न बचेगा जिसे हलाल न बना लें और कोई अहद व पैमान न बचेका जिसे तोड़ न दें और कोई मकान या ख़ेमा बाक़ी न रहेगा जिसमें इनका ज़ुल्म दाखि़ल न हो जाए और उनका बदतरीन बरताव उन्हें तर्के वतन पर आमादा न कर दे और दोनों तरह के लोग रोने पर आमादा न हो जाएं। दुनियादार अपनी दुनिया के लिये रोए और दीनदार अपने दीन की तबाही पर आँसू बहाए, और तुममें एक का दूसरे से मदद तलब करना उसी तरह हो जिस तरह के ग़ुलाम आक़ा से मदद तलब करे के सामने आ जाए तो इताअत करे और ग़ायब हो जाए तो ग़ीबत करे। और तुममें सबसे ज़्यादा मुसीबतज़दा वह हो जो ख़ुदा पर सबसे ज़्यादा एतमाद रखने वाला हो, लेहाज़ा अगर ख़ुदा तुम्हें आफ़ियत दे तो उसक क़ुबूल कर लो, और अगर तुम्हारा इम्तेहान लिया जाए तो सब्र करो के अन्जामकार बहरहाल साहेबाने तक़वा के लिये है।

(((- दुनिया के हर ज़ुल्म के मुक़ाबले में साहबाने ईमान व किरदार के लिये यही बषारत काफ़ी है के अन्जामकार साहबाने तक़वा के हाथ में है और इस दुनिया की इन्तेहाई फ़साद और तबाहकारी पर होने वाली नहीं है बल्कि उसे एक न एक दिन बहरहाल अद्ल व इन्साफ़ से मामूर होना है। उस दिन हर ज़ालिम को उसके ज़ुल्म का अन्दाज़ा हो जाएगा और हर मज़लूम को उसके सब्र का फल मिल जाएगा। मालिके कायनात की यह बषारत न होती तो साहेबाने ईमान के हौसले पस्त हो जाते और उन्हें हालाते ज़माना मायूसी का षिकार बना देते लेकिन इस बषारत ने हमेषा उनके हौसलों को बलन्द रखा है और इसी की बुनियाद पर वह हर दौर में हर ज़ालिम से टकराने का हौसला रखे रहे हैं।)))

99-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें दुनिया से किनाराकषी की दावत दी गई है।)

ख़ुदा की हम्द है उस पर जो हो चुका और उसकी इमदाद का तक़ाज़ा है के उन हालात पर जो सामने आने वाले हैं, हम उससे दीन की सलामती का तक़ाज़ा उसी तरह करते हैं जिस तरह बदन की सेहत व आफ़ियत की दुआ करते हैं।

बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें वसीयत करता हूँ के उस दुनिया को छोड़ दो जो तुम्हें बहरहाल छोड़ने वाली है चाहे तुम उसकी जुदाई पसन्द न करो, वह तुम्हारे जिस्म को बहरहाल बोसीदा कर देगी तुम लाख उसकी ताज़गी की ख़्वाहिष करो, तुम्हारी और उसकी मिसाल उन मुसाफ़िरों जैसी है जो किसी रास्ते पर चले और गोया के मन्ज़िल तक पहुंच गए। किसी निषाने राह का इरादा किया और गोया के उसे हासिल कर लिया और कितना थोड़ा वक़्फ़ा होता है इस घोड़ा दौड़ाने वाले के लिये जो दौड़ाते ही मक़सद तक पहुंच जाए। इस शख़्स की बक़ा ही क्या है जिसका एक दिन मुक़र्रर हो जिससे आगे न बढ़ सके और फ़िर मौत तेज़ रफ़्तारी से उसे हंका कर ले जा रही हो यहाँ तक के बादल-नाख़्वास्ता दुनिया को छोड़ दे, ख़बरदार दुनिया की इज़्ज़त और इसकी सरबलन्दी में मुक़ाबला न करना और इसकी ज़ीनत व नेमत को पसन्द न करना और इसकी दुष्वारी और परेषानी से रंजीदा न होना के इसकी इज़्ज़त व सरबलन्दी ख़त्म हो जाने वाली है और उसकी ज़ीनत व नेमत को ज़वाल आ जाने वाला है और उसकी तंगी और सख़्ती बहरहाल ख़त्म हो जाने वाली है, यहाँ हर मुद्दत की एक इन्तेहा है और हर ज़िन्दा के लिये फ़ना है। क्या तुम्हारे लिये गुज़िष्ता लोगों के आसार में सामाने तम्बीह नहीं है? और क्या आबा व अजदाद की दास्तानों में बसीरत व इबरत नहीं है? अगर तुम्हारे पास अक़्ल है, क्या तुमने यह नहीं देखा है के जाने वाले पलट कर नहीं आते हैं और बाद में आने वाले रह नहीं जाते हैं, क्या तुम नहीं देखते हो के अहले दुनिया मुख़्तलिफ़ हालात में सुबह व शाम करते हैं। कोई मुर्दा है जिस पर गिरया हो रहा है और कोई ज़िन्दा है तो उसे पुरसा दिया जा रहा है। एक बिस्तर पर पड़ा हुआ है तो एक इसकी अयादत कर रहा है और एक अपनी जान से जा रहा है। कोई दुनिया तलाष कर रहा है तो मौत उसे तलाष कर रही है और कोई ग़फ़लत में पड़ा हुआ है तो ज़माना उससे ग़ाफ़िल नहीं है और इस तरह जाने वालों के नक़्षे क़दम पर रह जाने वाले चले जा रहे हैं। आगाह हो जाओ के अभी मौक़ा है उसे याद करो जो लज़्ज़तों को फ़ना कर देने वाली, ख़्वाहिषात को मुकदर कर देने वाली और उम्मीदों को क़ता कर देने वाली है। ऐसे औक़ात में जब बुरे आमाल का इरतेकाब कर रहे हो और अल्लाह से मदद मांगो के इसके वाजिब हक़ को अदा कर दो और उन नेमतों का शुक्रिया अदा कर सको जिनका शुमार करना नामुमकिन है।

(((- ख़ुदा जानता है के ज़िन्दगी की इससे हसीनतर ताबीर नहीं हो सकती है के इन्सान ज़िन्दगी के प्रोग्राम बनाता ही रह जाता है और मौत सामने आकर खड़ी हो जाती है, ऐसा मालूम होता है के घोड़े ने दम भरने का इरादा ही किया था के मन्ज़िल क़दमों में आ गई और सारे हौसले धरे रह गये। ज़ाहिर है के इस ज़िन्दगी की क्या हक़ीक़त है के जिसकी मीआद मुअय्यन है और वह भी ज़्यादा तवील नहीं है और हर हाल में पूरी हो जाने वाली है चाहे इन्सान मुतवज्जोह हो या ग़ाफ़िल, और चाहे उसे पसन्द करे या नापसन्द।)))

100-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (रसूले अकरम (स0) और आपके अहलेबैत (अ0) के बारे में)

शुक्र है उस ख़ुदा का जो अपने फ़ज़्लो करम का दामन फैलाए हुए है और अपने जूदो-अता का हाथ बढ़ाए हुए है। हम उसकी हम्द करते हैं उसके तमाम मआमलात में उसकी मदद चाहते हैं ख़ुद उसके हुक़ूक़ का ख़याल रखने के लिये, हम शहादत देते हैं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल हैं। जिन्हें उसने अपने अम्र के इज़हार और अपने ज़िक्र के बयान के लिये भेजा तो उन्होंने निहायत अमानतदारी के साथ उसके पैग़ाम को पहुंचा दिया और राहे रास्त पर इस दुनिया से गुज़र गए और हमारे दरम्यान एक ऐसा परचमे हक़ छोड़ गए के जो उससे आगे बढ़ जाए वह दीन से निकल गया और जो पीछे रह जाए वह हलाक हो गया और जो इससे वाबस्ता रहे वह हक़ के साथ रहा। उसकी तरफ़ रहनुमाइ करने वाला वह है जो बात ठहर कर करता है और क़याम इत्मीनान से करता है लेकिन क़याम के बाद फिर तेज़ी से काम करता है। देखो जब तुम उसके लिये अपनी गरदनों को झुका दोगे और हर मसले में उसकी तरफ़ इषारा करने लगोगे तो उसे मौत आ जाएगी और उसे लेकर चली जाएगी। फिर जब तक ख़ुदा चाहेगा तुम्हें उसी हाल में रहना पड़ेगा यहां तक के वह इस शख़्स को मन्ज़रे आम पर ले आए, जो तुम्हें एक मक़ाम पर जमा कर दे और तुम्हारे इन्तेषार को दूर कर दे। तो देखो जो आने वाला है उसके अलावा किसी की तमअ न करो और जो जा रहा है उससे मायूस न हो जाओ, हो सकता है के जाने वाले का एक क़दम उखड़ जाए तो दूसरा जमा रहे और फिर ऐसे हालात पैदा हो जाएं के दोनों क़दम जम जाएं। देखो आले मोहम्मद (स0) की मिसाल आसमान के सितारों जैसी है के जब एक सितारा ग़ायब हो जाता है तो दूसरा निकल आता है, तो गोया अल्लाह की नेमतें तुम पर तमाम हो गई हैं और उसने तुम्हें वह सब कुछ दिखला दिया है जिसकी तुम आस लगाए बैठे थे।

101- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जो उन ख़ुत्बों में है जिनमें हवादिस ज़माना का ज़िक्र किया गया है)

सारी तारीफ़ उस अव्वल के लिये हैं जो हर एक से पहले है और उस आखि़र के लिये है जो हर एक के बाद है। उसकी अव्वलीयत का तक़ाज़ा है के उसका अव्वल न हो और इसकी आखि़रत का तक़ाज़ा है के इसका कोई आखि़र न हो। मैं गवाही देता हूँ के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और इस गवाही में मेरा बातिन ज़ाहिर के मुताबिक़ है और मेरी ज़बान दिल से मुकम्मल तौर पर हमआहंग है।

(((-उससे मुराद ख़ुद हज़रत अली (अ0) की ज़ाते गिरामी है जिसे हक़ का महवर व मरकज़ बनाया गया है और जिसके बारे में रसूले अकरम (स0) की दुआ है के मालिक हक़ को उधर-उधर फेर दे जिधर-जिधर अली (अ0) मुड़ रहे हों (सही तिरमिज़ी) और बाद के फ़िक़रात में आले मोहम्मद (अ0) के दीगर अफ़राद की तरफ़ इषारा है जिनमें मुस्तक़बिल क़रीब में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ0) और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ0) का दौर था जिनकी तरफ़ अहले दुनिया ने रूजू किया और उनकी सियासी अज़मत का भी एहसास किया और मुस्तक़बिल बईद में इमाम मेहदी (अ0) का दौर है जिनके हाथों उम्मत का इन्तेषार दूर होगा और इस्लाम पलटकर अपने मरकज़ पर आ जाएगा। ज़ुल्म व जौर का ख़ात्मा होगा और अद्ल व इन्साफ़ का निज़ाम क़ायम हो जाएगा-)))

अय्योहन्नास! ख़बरदार मेरी मुख़ालफ़त की ग़लती न करो और मेरी नाफ़रमानी करके हैरान व सरगर्दान न हो जाओ और मेरी बात सुनते वक़्त एक-दूसरे को इषारे न करो के उस परवरदिगार की क़सम जिसने दाने को षिगाफ़्ता किया है और नुफ़ूस को ईजाद किया है के मैं जो कुछ ख़बर दे रहा हूँ वह रसूले उम्मी की तरफ़ से है जहां न पहुंचाने वाला ग़लत गो था और न सुनने वाला जाहिल था और गोया के मैं उस बदतरीन गुमराह को भी देख रहा हूँ जिसने शाम में ललकारा और कूफ़े के एतराफ़ में अपने झण्डे गाड़ दिये और उसके बाद जब इसका दहाना खुल गया और उसकी लगाम का दहाना मज़बूत हो गया और ज़मीन में उसकी पामालियां सख़्ततर हो गई तो फ़ितने अबनाए ज़माना को अपने दांतों से काटने लगे और जंगों ने अपने थपेड़ों की लपेट में ले लिया और दिनों की सख़्ितयां और रातों की जराहतें मन्ज़रे आम पर आ गईं और फिर जब इसकी खेती तैयार होकर अपने पैरों पर खड़ी हो गई और इसकी सरमस्तियां अपना जोष दिखलाने लगीं और तलवारें चमकने लगीं तो सख़्त तरीन फ़ितनों के झण्डे गाड़ दिये गए और वह तारीक रात और तलातुम ख़ेज़ समन्दर की तरह मन्ज़रे आम पर आ गए, और कूफ़े को इसके अलावा भी कितनी ही आन्धियां पारा-पारा करने वाली हैं और उस पर से कितने ही झक्कड़ गुज़रने वाले हैं और अनक़रीब वहां जमाअतें जमाअतों से गुथने वाली हैं और खड़ी खेतियां काटी जाने वाली हैं और कटे हुए माहसल को भी तबाह व बरबाद किया जाएगा।

102-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें क़यामत और इसमें लोगों के हालात का ज़िक्र किया गया है)

वह दिन वह होगा जब परवरदिगार अव्वलीन व आख़ेरीन को दक़ीक़तरीन हिसाब और आमाल की जज़ा के लिये इस तरह जमा करेगा के सब ख़ुज़ू व ख़ुषू के आलम में खड़े होंगे, पसीना इनके दहन तक पहुँचा होगा और ज़मीन लरज़ रही होगी। बेहतरीन हाल उसका होगा जो अपने क़दम जमाने की जगह हासिल कर लेगा और जिसे सांस लेने का मौक़ा मिल जाएगा।

(((-रसूले अकरम (स0) के दौर में अब्दुल्लाह बिन उबी और मौलाए कायनात (अ0) के दौर में अषअत बिन क़ैस जैसे अफ़राद हमेषा रहे हैं जो बज़ाहिर साहेबाने ईमान की सफ़ों में रहते हैं लेकिन इनका काम बातों का मज़ाक़ उड़ाकर उन्हें मुष्तबा बना देने और क़ौम में इन्तेषार पैदा कर देने के अलावा कुछ नहीं होता है। इसलिये आपने चाहा के अपनी ख़बरों के मसदर व माखि़ज़ की तरफ़ इषारा कर दें ताके ज़ालिमों को शुबहा पैदा करने का मौक़ा न मिले और आप इस हक़ीक़त को भी वाज़े कर सकें के मेरे बयान में शुबह दर हक़ीक़त रसूले अकरम (स0) की सिदाक़त में शुबह है जो कुफ़्फ़ार व मुष्रेकीने मक्का भी न कर सके तो मुनाफ़िक़ीन के लिये इसका जवाज़ किस तरह पैदा हो सकता है?  इसके बाद आपने इस नुक्ते की तरफ़ भी इषारा फ़रमा दिया के अगर बाक़ी लोग यह काम नहीं कर सकते हैं तो इसका ताल्लुक़ उनकी जेहालत से है रिसालत के ओहदए फ़याज़ से नहीं है, उसने तो हर एक को तालीमे दुनिया चाही लेकिन बे सलाहियत अफ़राद इस फ़ैज़ से महरूम रह गए तो करीम का क्या क़ुसूर है।)))

इसी ख़ुत्बे का एक हिस्सा

ऐसे फ़ित्ने जैसे अन्धेरी रात के टुकड़े जिसके सामने न घोड़े खड़े हो सकेंगे और न उनके परचमों को पलटाया जा सकेगा, यह फ़ित्ने लगाम व सामान की पूरी तैयारी के साथ आएँगे के इनका क़ाएद उन्हें हंका रहा होगा और उनका सवाल उन्हें थका रहा होगा। इसकी अहल एक क़ौम होगी जिसके हमले सख़्त होंगे लेकिन लूट मार कम और उनका मुक़ाबला राहे ख़ुदा में सिर्फ़ वह लोग करेंगे जो मुस्तकबरीन की निगाह में कमज़ोर और पस्त होंगे। वह अहले दुनिया में मजहूल और अहले आसमान में मारूफ़ होंगे।

ऐ बसरा! ऐसे वक़्त में तेरी हालत क़ाबिले रहम होगी इस अज़ाबे इलाही के लष्कर की बना पर जिसमें न ग़ुबार होगा न शोर व ग़ोग़ा और अनक़रीब तेरे बाषिन्दों को सुखऱ् मौत और सख़्त भूक में मुब्तिला किया जाएगा।

103-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (ज़ोहद के बारे में)

अय्योहन्नास! दुनिया की तरफ़ इस तरह देखो जैसे वह लोग देखते हैं जो ज़ोहद रखने वाले और उससे नज़र बचाने वाले होते हैं के अनक़रीब यह अपने साकिनों को हटा देगी और अपने ख़ुषहालों को रन्जीदा कर देगी। इसमें जो चीज़ मुंह फेरकर जा चुकी वह पलट कर आने वाली नहीं है और जो आने वाली है उसका हाल नहीं मालूम है के इसका इन्तेज़ार किया जाए। इसकी ख़ुषी रन्ज से मख़लूत है और इसमें मर्दों की मज़बूती ज़ोफ़ व नातवानी की तरफ़ माएल है। ख़बरदार इसकी दिल लुभाने वाली चीज़ें तुम्हें धोके में न डाल दे ंके इसमें से साथ जाने वाली चीज़ें बहुत कम हैं। 
ख़ुदा रहमत नाज़िल करे उस शख़्स पर जिसने ग़ौर व फ़िक्र किया तो इबरत हासिल की और इबरत हासिल की तो बसीरत पैदा कर ली के दुनिया की हर मौजूद शै अनक़रीब ऐसी हो जाएगी जैसे थी ही नहीं और आख़ेरत की चीज़ें इस तरह हो जाएंगी जैसे अभी मौजूद हैं। हर गिनती में आने वाला कम होने वाला है और हर वह शै जिसकी उम्मीद हो वह अनक़रीब आने वाली है और जो आने वाला है वह गोया के क़रीब और बिल्कुल क़रीब है।
(सिफ़ते आलिम) आलिम वह है जो अपनी क़द्र ख़ुद पहचाने और इन्सान की जेहालत के लिये इतना ही काफ़ी है के वह अपनी क़द्र को न पहचाने। अल्लाह की निगाह में बदतरीन बन्दा वह है जिसे उसने उसी के हवाले कर दिया हो के वह सीधे रास्ते से हट गया है और बग़ैर रहनुमा के चल रहा है। 
(((- हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सान अपनी क़द्र व औक़ात को पहचान लेता है तो उसका किरदार ख़ुद-ब-ख़ुद सुधर जाता है और इस हक़ीक़त से ग़ाफ़िल हो जाता है तो कभी क़द्र व मन्ज़िलत से ग़फ़लत दरबारदारी, ख़ुषामद, मदहे बेजा, ज़मीर फ़रोषी पर आमादा कर देती है के इल्म को माल व जाह के एवज़ बेचने लगता है और कभी औक़ात से नावाक़फ़ीयत मालिक से बग़ावत पर आमादा कर देती है के अवामुन्नास पर हुकूमत करते-करते मालिक की इताअत का जज़्बा भी ख़त्म हो जाता है और एहकामे इलाही को भी अपनी ख़्वाहिषात के रास्ते पर चलाना चाहता है जो जेहालत का बदतरीन मुज़ाहिरा है और इसका इल्म से कोई ताल्लुक़ नहीं है-!)))

ऐ दुनिया के कारोबार की दावत दी जाए तो अमल पर आमादा हो जाता है और आख़ेरत के काम की दावत दी जाए तो सुस्त हो जाता है। गोया के जो कुछ किया है वही वाजिब था और जिसमें सुस्ती बरती है वह उससे साक़ित है।

(आखि़र ज़माना) वह ज़माना ऐसा होगा जिसमें सिर्फ़ वही मोमिन निजात पा सकेगा जो गोया के सो रहा होगा के मजमे में आए तो लोग उसे पहचान न सकें और ग़ाएब हो जाए तो कोई तलाष न करे। यही लोग हिदायत के चिराग़ और रातों के मुसाफ़िरों के लिये निषान मन्ज़िल होंगे न इधर उधर लगाते फिरेंंगे और न लोगों के उयूब की इषाअत करेंगे। उनके लिये अल्लाह रहमत के दरवाज़े खोल देगा और उनसे अज़ाब की सख़्ितयों को दूर कर देगा।
लोगों!  अनक़रीब एक ज़माना आने वाला है जिसमें इस्लाम को इसी तरह उलट दिया जाएगा जिस तरह बरतन को उसके सामान समेत उलट दिया जाता है। लोगों! अल्लाह ने तुम्हें इस बात से पनाह दे रखी है के वह तुम पर ज़ुल्म करे लेकिन तुम्हें इस बात से महफ़ूज़ नहीं रखा है के तुम्हारा इम्तेहान न करे। इस मालिके जल्लाजलालोह ने साफ़ एलान कर दिया है के ‘‘इसमें हमारी खुली हुई निषानियां हैं और हम बहरहाल तुम्हारा इम्तेहान लेने वाले हैं’’
सय्यद शरीफ़ रज़ी - मोमिन के नौमए (ख़्वाबीदा) होने का मतलब इसका गुमनाम और बेषर होना है और मसायीह, मिस्याह की जमा है और वह वह शख़्स है के जिसे किसी का ऐब मालूम हो जाए तो उसकी इषाअत के बग़ैर चैन न पड़े। बुज़ुर-बुज़दर की जमा है यानी वह शख़्स जिसकी हिमाक़त ज़यादा है और उसकी गुफ़्तगू लग़्िवयात पर मुष्तमिल हो।