True Islam– Shia, Shiyat (SHEEYAT)

KULLO YAUMIN AASHOORA, KULLO ARZIN KARBALA aap sabki duaao ka talib- Haider Alam Rizvi

68- आपका इरषादे गिरामी (जब आपने मोहम्मद बिन अबीबक्र को मिस्र की ज़िम्मेदारी हवाले की और उन्हें क़त्ल कर दिया गया)

मेरा इरादा था के मिस्र का हाकिम हाषिम बिन अतबा को बनाऊं अगर उन्हें बना देता तो हरगिज़ मैदान को मुख़ालेफ़ीन के लिये ख़ाली न छोड़ते और उन्हें मौक़े से फ़ायदा न उठाने देते (लेकिन हालात ने ऐसा न करने दिया)। इस बयान का मक़सद मोहम्मद बिन अबीबक्र की मज़म्मत नहीं है इसलिये के वह मुझे अज़ीज़ था और मेरा ही परवरदा था।

(((उस्ताद अहमद हसन याक़ूब ने किताब नज़रियए अदालते सहाबा में एक मुफ़स्सिल बहस की है के सक़ीफ़ा में कोई क़ानून इज्तेमाअ इन्तख़ाब ख़लीफ़ा के लिये नहीं हुआ था और न कोई इसका एजेन्डा था और न सवा लाख सहाबा की बस्ती में से दस बीस हज़ार अफ़राद जमा हुए थे बल्कि सअद बिन अबादा की बीमारी की बिना पर अन्सार अयादत के लिये जमा हुए थे और बाज़ मुहाजेरीन ने इस इज्तेमाअ को देखकर यह महसूस किया के कहीं खि़लाफ़त का फ़ैसला न हो जाए, तो बरवक़्त पहुंचकर इस क़द्र हंगामा किया के अन्सार में फूट पड़ गई और फ़िल ज़ोर हज़रत अबूबक्र की खि़लाफ़त का एलान कर दिया और सारी कारवाई लम्हों में यूं मुकम्मल हो गई के सअद बिन अबादा को पामाल कर दिया गया और हज़रत अबूबक्र ‘‘ताजे खि़लाफ़त’’ सर पर रखे हुए सक़ीफ़ा से बरामद हो गए। इस शान से के इस अज़ीम मुहिम की बिना पर जनाज़ाए रसूल में षिरकत से भी महरूम हो गए और खि़लाफ़त का पहला असर सामने आ गया।  हाषिम बिन अतबा सिफ़फीन में अलमदारे लष्करे अमीरूल मोमेनीन थे। मिरक़ाल उनका लक़ब था के निहायत तेज़ रफ़तारी और चाबकदस्ती से हमला करते थे। मोहम्मद बिन अबीबक्र अस्मार बिन्त ऐस के बत्न से थे जो पहले जनाबे जाफ़रे तैयार की ज़ौजा थीं और उनसे अब्दुल्लाह बिन जाफ़र पैदा हुए थे इसके बाद इनकी शहादत के बाद अबूबक्र की ज़ौजियत में आ गईं जिनसे मोहम्मद पैदा हुए और इनकी वफ़ात के बाद मौलाए कायनात की ज़ौजियत में आईं और मोहम्मद ने आपके ज़ेर असर तरबियत पाई यह और बात है के जब अम्र व आस ने चार हज़ार के लष्कर के साथ मिस्र पर हमला किया तो आपने आबाई उसूले जंग की बिना पर मैदान से फ़रार इख़्तेयार किया और बाला आखि़र क़त्ल हो गए और लाष को गधे की खाल में रख कर जला दिया गया या बरिवायते ज़िन्दा ही जला दिये गए और माविया ने इस ख़बर को सुनकर इन्तेहाई मसर्रत का इज़हार किया। (मरूजुल ज़हब)
अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने इस मौक़े पर हाषिम को इसीलिये याद किया था के वह मैदान से फ़रार न कर सकते थे और किसी घर के अन्दर पनाह लेने का इरादा भी नहीं कर सकते थे।)))

69- आपका इरषादे गिरामी (अपने असहाब को सरज़न्ष करते हुए)

कब तक मैं तुम्हारे साथ वह नरमी का बरताव करूं जो बीमार ऊंट के साथ किया जाता है जिसका कोहान अन्दर से खोखला हो गया हो या इस बोसीदा कपड़े के साथ किया जाता है जिसे एक तरफ़ से सिया जाए तो दूसरी तरफ़ से फट जाता है। जब भी शाम का कोई दस्ता तुम्हारे किसी दस्ते के सामने आता है तो तुममें से हर शख़्स अपने घर का दरवाज़ा बन्द कर लेता है और इस तरह छिप जाता है जैसे सूराख़ में गोह या भट में बिज्जू। ख़ुदा की क़सम ज़लील वही होगा जिसके तुम जैसे मददगार होंगे और जो तुम्हारे ज़रिये तीरअन्दाज़ी करेगा गोया वह सोफ़ारे षिकस्ता और पैकाने निदाष्ता तीर से निषाना लगाएगा ख़ुदा की क़सम तुम सहने ख़ाना में बहुत दिखाई देते हो और परचमे लष्कर के ज़ेरे साये बहुत कम नज़र आते हो। मैं तुम्हारी इस्लाह का तरीक़ा जानता हूं और तुम्हें सीधा कर सकता हूं लेकिन क्या करूं अपने दीन को बरबाद करके तुम्हारी इस्लाह नहीं करना चाहता हूं। ख़ुदा तुम्हारे चेहरों को ज़लील करे और तुम्हारे नसीब को बदनसीब करे। तुम हक़ को इस तरह नहीं पहुंचाते हो जिस तरह बातिल की मारेफ़त रखते हो और बातिल को इस तरह बातिल नहीं क़रार देते हो जिस तरह हक़ को ग़लत ठहराते हो।

70-आपका इरषादे गिरामी (उस सहर के हंगाम जब आपके सरे अक़दस पर ज़रबत लगाई गई)

अभी मैं बैठा हुआ था के अचानक आंख लग गई और ऐसा महसूस हुआ के रसूले अकरम (स0) के सामने तषरीफ़ फ़रमा हूँ। मैंने अर्ज़ की के मैंने आपकी उम्मत से बेपनाह कजरवी और दुष्मनी का मुषाहेदा किया है, फ़रमाया के बददुआ करो?  तो मैंने यह दुआ की ख़ुदाया मुझे इनसे बेहतर क़ौम दे दे और इन्हें मुझसे सख़्ततर रहनुमा दे दे।

(((यह भी रूयाए सादेक़ा की एक क़िस्म है जहां इन्सान वाक़ेयन यह देखता है और महसूस करता है जैसे ख़्वाब की बातों को बेदारी के आलम में देख रहा हो। रसूले अकरम (स0) का ख़्वाब में आना किसी तरह की तरदीद और तश्कीक का मुतहम्मल नहीं हो सकता है लेकिन यह मसला बहरहाल क़ाबिले ग़ौर है के जिस वसी ने इतने सारे मसायब बरदाष्त कर लिये और उफ़ तक नहीं की उसने ख़्वाब में रसूले अकरम (स0) को देखते ही फ़रयाद कर दी और जिस नबी ने सारी ज़िन्दगी मज़ालिम व मसाएब का सामना किया और बददुआ नहीं की, उसने बददुआ करने का हुक्म किस तरह दे दिया?
हक़ीकते अम्र यह है के हालात उस मन्ज़िल पर थे जिसके बाद फ़रयाद भी बरहक़ थी और बददुआ भी लाज़िम थी। अब यह मौलाए कायनात का कमाले किरदार है के बराहे रास्त क़ौम की तबाही और बरबादी की दुआ नहीं की बल्के उन्हें ख़ुद इन्हीं के नज़रियात के हवाले कर दिया के ख़ुदाया! यह मेरी नज़र में बुरे हैं तो मुझे इनसे बेहतर असहाब दे दे और मैं इनकी नज़र में बुरा हूं तो उन्हें मुझसे बदतर हाकिम दे दे ताके इन्हें अन्दाज़ा हो के बुरा हाकिम क्या होता है? मौलाए कायनात (अ0) की यह दुआ फ़िलज़ोर क़ुबूल हो गई और चन्द लम्हों के बाद आपको मासूम बन्दगाने ख़ुदा का जवार हासिल हो गया और शरीर क़ौम से निजात मिल गई।)))

71-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (अहले इराक़ की मज़म्मत के बारे में)

अम्माबाद! ऐ एहले ईराक़ ! बस तुम्हारी मिसाल उस हामला औरत की है जो 9 माह तक बच्चे को षिकम में रखे और जब विलादत का वक़्त आए तो साक़ित कर दे और फिर उसका शौहर भी मर जाए और ब्योगी की मुद्दत भी तवील हो जाए के क़रीब का कोई वारिस न रह जाए और दूर वाले वारिस हो जाएं।
ख़ुदा गवाह है के मैं तुम्हारे पास अपने इख़्तेदार से नहीं आया हूं बल्के हालात के जब्र से आया हूं और मुझे यह ख़बर मिली है के तुम लोग मुझ पर झूट का इल्ज़ाम लगाते हो। ख़ुदा तुम्हें ग़ारत करे। मैं किसके खि़लाफ़ ग़लत बयानी करूंगा? ख़ुदा के खि़लाफ़ ? जबके मैं सबसे पहले उस पर ईमान लाया हूँ।  या रसूले ख़ुदा के खि़लाफ़? जबके मैंने सबसे पहले उनकी तस्दीक़ की है।  ळरगिज़ नहीं! बल्कि यह बात ऐसी थी जो तुम्हारी समझ से इसके अहल नहीं थे। ख़ुदा तुमसे समझे। मैं तुम्हें जवाहर पारे नाप नाप कर दे रहा हूँ और कोई क़ीमत नहीं मांग रहा हूँ। मगर ऐ काष तुम्हारे पास इसका ज़र्फ़ होता। और अनक़रीब तुम्हें इसकी हक़ीक़त मालूम हो जाएगी।

(((दहवल अर्ज़ के बारे में दो तरह के तसव्वुरात पाए जाते हैं। बाज़ हज़रात का ख़याल है के ज़मीन को आफ़ताब से अलग करके फ़िज़ाए बसीत में लुढ़का दिया गया और इसी का नाम दहवल अर्ज़ है और बाज़ हज़रात का कहना है के दहव के मानी फ़र्ष बिछाने के हैं। गोया के ज़मीन को हमवार बनाकर क़ाबिले सुकूनत बना दिया गया और यही दहवल अर्ज़ है। बहरहाल रिवायात में इसकी तारीख़ 25 ज़ीक़ादा बताई गई है जिस तारीख़ को सरकारे दो आलम (स0) हुज्जतुलविदा के लिये मदीने से बरामद हुए थे और तख़लीक़े अर्ज़ की तारीख़ मक़सदे तख़लीक़ से हमआहंग हो गई थी। इस तारीख़ में रोज़ा रखना बेपनाह सवाब का हामिल है और यह तारीख़ साल के उन चार दिनों में शामिल है जिसका रोज़ा अज्र बेहिसाब रखता है। 25 ज़ीक़ादा, 17 रबीउल अव्वल, 27 रजब और 18 ज़िलहिज्जा  ग़ौर कीजिये तो यह निहायत दरजए हसीन इन्तेख़ाबे क़ुदरत है के पहला दिन वह है जिसमें ज़मीन का फ़र्ष बिछाया गया, दूसरा दिन वह है जब मक़सदे तख़लीक़ कायनात को ज़मीन पर भेजा गया, तीसरा दिन वह है जब इसके मन्सब का एलान करके इसका काम शुरू कराया गया और आखि़री दिन वह है जब इसका काम मुकम्मल हो गया और साहबे मन्सब को ‘‘अकमलतो लकुम दीनेकुम’’ की सनद मिल गई।)))

72- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें लोगों को सलवात की तालीम दी गई है और सिफ़ाते ख़ुदा और रसूल (स0) का ज़िक्र किया गया है)

ऐ ख़ुदा! ऐ फ़र्षे ज़मीन के बिछाने वाले और बलन्दतरीन आसमानों को रोकने वाले और दिलों को इनकी नेक बख़्त या बदबख़्त फ़ितरतों पर पैदा करने वाले, अपनी पाकीज़ा तरीन और मुसलसल बढ़ने वाले बरकात को अपने बन्दे और रसूल हज़रत मोहम्मद (स0) पर क़रार दे जो सिलसिलए नबूवतों के ख़त्म करने वाले दिलो दिमाग़ के बन्द दरवाज़ों को खोलने वाले, हक़ के ज़रिये हक़ का एलान करने वाले, बातिल के जोष व ख़रोष को दफ़ा करने वाले और गुमराहियों के हमलों का सर कुचलने वाले थे। जो बार जिस तरह इनके हवाले किया गया उन्होंने उठा लिया। तेरे अम्र के साथ क़याम किया। तेरी मर्ज़ी की राह में तेज़ क़दम बढ़ाते रहे, न आगे बढ़ने से इनकार किया और न इनके इरादों में कमज़ोरी आई। तेरी वही को महफ़ूज़ किया तेरे अहद की हिफ़ाज़त की, तेरे हुक्म के निफ़ाज़ की राह में बढ़ते रहे यहां तक के रोषनी की जुस्तजू करने वालों के लिये आगणन रौषन कर दी और कुम करदा राह के लिये रास्ता वाज़ेह कर दिया। इनके ज़रिये दिलों ने फ़ितनों और गुनाहों में ग़र्क़ रहने के बाद भी हिदायत पा ली और इन्होंने रास्ता दिखाने वाले निषानात और वाज़ेह एहकाम क़ायम कर दिये। वह तेरे अमानतदार बन्दे, तेरे पोषीदा उलूम के ख़ज़ानादार, रोज़े क़यामत के लिये तेरे राहे हक़ के साथ भेजे हुए और मख़लूक़ात की तरफ़ तेरे नुमाइन्दे थे। ख़ुदाया इनके लिये अपने सायए रहमत में वसीअतरीन मन्ज़िल क़रार दे दे और इनके ख़ैर को अपने फ़ज़्ल से दुगना, चैगना कर दे। ख़ुदाया इनकी इमारत को तमाम इमारतों से बलन्दतर और इनकी मन्ज़िल को अपने पास बुज़ुर्गतर बना दे। इनके नूर की तकमील फ़रमा और असरे रिसालत के सिले में इन्हें मक़बूल शहादत और पसन्दीदा अक़वाल का इनआम इनायत कर के इनकी गुफ़्तगू हमेषा आदिलाना और इनका फ़ैसला हमेषा हक़ व बातिल के दरमियान हदे फ़ासिल रहा है। ख़ुदाया हमें इनके साथ ख़ुषगवार ज़िन्दगी, नेमात की मन्ज़िल, ख़्वाहिषात व लज़्ज़ात की तकमील के मरकज़, आराइष व तमानत के मुक़ाम और करामत व शराफ़त के तोहफ़ों की मन्ज़िल पर जमा कर दे।

(((यह इस्लाम का मख़सूस फ़लसफ़ा है जो दुनियादारी के किसी निज़ाम में नहीं पाया जाता है। दुनियादारी का मषहूर व मारूफ़ निज़ाम व उसूल यह है के मक़सद हर ज़रिये को जाएज़ बना देता है। इन्सान को फ़क़त यह देखना चाहिये के मक़सद सही और बलन्द हो। इसके बाद इस मक़सद तक पहुंचने के लिये कोई भी रास्ता इख़्तेयार कर ले इसमें कोई हर्ज और मुज़ाएक़ा नहीं है लेकिन इसलाम का निज़ाम इससे बिल्कुल मुख़्तलिफ़ है, वह दुनिया में मक़सद और मज़हब दोनों का पैग़ाम लेकर आया है।  इसने ‘‘इन्नद्दीन’’ कहकर एलान किया है के इस्लाम तरीक़ाए हयात है और ‘‘इन्दल्लाह’’ कहकर वाज़ेह किया है के इसका हदफ़ हक़ीक़ी ज़ात परवरदिगार है। लेहाज़ा वह न ग़लत मक़सद को मक़सद क़रार देने की इजाज़त दे सकता है और न ग़लत रास्ते को रास्ता क़रार देने की। इसका मन्षा यह है के इसके मानने वाले सही रास्ते पर चलें और इसी रास्ते के ज़रिये मन्ज़िल तक पहुंचें। चुनांचे मौलाए कायनात ने सरकारे दो आलम (स0) की इसी फ़ज़ीलत की तरफ़ इषारा किया है के जब आपने जाहेलीयत के नक़्क़ारख़ाने में आवाज़े हक़ बलन्द की है लेकिन इस आवाज़ को बलन्द करने का तरीक़ा और रास्ता भी सही इख़्तेयार किया है वरना जाहेलीयत में आवाज़ बलन्द करने का एक तरीक़ा यह भी था के इस क़द्र शोर मचाओ के दूसरे की आवाज़ न सुनाई दे। इस्लाम ऐसे अहमक़ाना अन्दाज़े फ़िक्र की हिमायत नहीं कर सकता है। वह अपने फातेहीन से भी यही मुतालेबा करता है के हक़ का पैग़ाम हक़ के रास्ते से पहुंचाओ, ग़ारतगिरी और लूटमार के ज़रिये नहीं। यह इस्लाम की पैग़ाम रसानी नहीं है। ख़ुदा और रसूल (स0) के लिये ईज़ारसानी है जिसका जुर्म इन्तेहाई संगीन है और इसकी सज़ा दुनिया व आख़ेरत दोनों की लानत है।))

73- आपका इरषादे गिरामी  (जो मरवान बिन अलहकम से बसरा में फ़रमाया)

 कहा जाता है के जब मरवान बिन अलहकम जंग में गिरफ़्तार हो गया तो इमाम हसन (अ0) व हुसैन (अ0) ने अमीरूल मोमेनीन (अ0) से इसकी सिफ़ारिष की और आपने उसे आज़ाद कर दिया तो दोनों हज़रात ने अर्ज़ की के या अमीरूल मोमेनीन (अ0)! आपकी बैयत करना चाहता है तो आपने फ़रमाया-
क्या उसने क़त्ले उस्मान के बाद मेरी बैअत नहीं की थी ? मुझे इसकी बैअत की कोई ज़रूरत नहीं है, यह एक यहूदी क़िस्म का हाथ है, अगर हाथ से बैअत कर भी लेगा तो रकीक तरीक़े से इसे तोड़ डालेगा। याद रखो इसे भी हुकूमत मिलेगी मगर सिर्फ़ इतनी देर जितनी देर में कुत्ता अपनी नाक चाटता है। इसके अलावा यह चार बेटों का बाप भी है और उम्मते इस्लामिया इससे और इसकी औलाद से बदतरीन दिन देखने वाली है।

 74- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जब लोगों ने उस्मान की बैअत करने का इरादा किया)

तुम्हें मालूम है के मैं तमाम लोगों में सबसे ज़्यादा खि़लाफ़त का हक़दार हूँ और ख़ुदा गवाह है के मैं उस वक्त तक हालात का साथ देता रहूंगा जब तक मुसलमानों के मसाएल ठीक रहें और ज़ुल्म सिर्फ़ मेरी ज़ात तक महदूद रहे ताके मैं इसका अज्र व सवाब हासिल कर सकूँ और इसी ज़ेब व ज़ीनते दुनिया से अपनी बेनियाज़ी का इज़हार कर सकूं जिसके लिये तुम सब मरे जा रहे हो।

75- आपका इरषादे गिरामी (जब आपको ख़बर मिली के बनी उमय्या आप पर ख़ूने उस्मान का इल्ज़ाम लगा रहे हैं)

क्या बनी उमय्या के वाक़ई मालूमात उन्हें मुझ पर इल्ज़ाम तराषी से नहीं रोक सके और क्या जाहिलों को मेरे कारनामे इस इत्तेहाम से बाज़ नहीं रख सके? यक़ीनन परवरदिगार ने तोहमत व अफतरा के खि़लाफ़ जो नसीहत फ़रमाई है वह मेरे बयान से कहीं ज़्यादा बलीग़ है। मैं बहरहाल इन बेदीनों पर हुज्जत तमाम करने वाला, इन अहद षिकन मुब्तिलाए तषकीक अफ़राद का दुष्मन हूँ, और तमाम मुष्तबा मामलात को किताबे ख़ुदा पर पेष करना चाहिये और रोज़े क़यामत बन्दों का हिसाब उनके दिलों के मज़मरात (नीयतों) ही पर होगा।

((( आले मोहम्मद (स0) के इस किरदार का तारीख़े कायनात में कोई जवाब नहीं है, इन्होंने हमेषा फ़ज़्लो करम से काम लिया है। हद यह है के अगर माज़ल्लाह इमाम हसन (अ0) व इमाम हुसैन (अ0) की सिफ़ारिष को मुस्तक़बिल के हालात से नावाक़फ़ीयत भी तसव्वुर कर लिया जाए तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ0) के तर्ज़े अमल को क्या कहा जा सकता है जिन्होंने वाक़ेअन करबला के बाद भी मरवान के घरवालों को पनाह दी है और इस बेहया ने हज़रत से पनाह की दरख़्वास्त की है। दरहक़ीक़त यह भी यहूदियत की एक शाख़ है के वक़्त पड़ने पर हर एक के सामने ज़लील बन जाओ और काम निकलने के बाद परवरदिगार की नसीहतों की भी दरहक़ीक़त परवाह न करो। अल्लाह दीने इस्लाम को हर दौर की यहूदियत से महफ़ूज़ रखे।

अमीरूल मोमेनीन (अ0) का मक़सद यह है के खि़लाफ़त मेरे लिये किसी हदफ़ और मक़सदे हयात का मरतबा नहीं रखती है। यह दरहक़ीक़त आम इन्सानियत के लिये सुकून व इत्मीनान फ़राहम करने का एक ज़रिया है। लेहाज़ा अगर यह मक़सद किसी भी ज़रिये से हासिल हो गया तो मेरे लिये सुकूत जाएज़ हो जाएगा और मैं अपने ऊपर ज़ुल्म बरदाष्त कर लूंगा। दूसरा फ़िक़रा इस बात की दलील है के बातिल खि़लाफ़त से मुकम्मल अद्ल व इन्साफ़ और सुकून व इत्मीनान की तवक़्क़ो मुहाल है लेकिन मौलाए कायनात (अ0) का मनषा यह है के अगर ज़ुल्म का निषाना मेरी ज़ात होगी तो बरदाष्त करूंगा लेकिन अवामुन्नास होंगे और मेरे पास माद्दी ताक़त होगी तो हरगिज़ बरदाष्त न करूंगा के यह अहदे इलाही के खि़लाफ़ है।)))

76- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जिसमें अमले स्वालेह पर आमादा किया गया है)

ख़ुदा रहमत नाज़िल करे उस बन्दे पर जो किसी हिकमत को सुने तो महफ़ूज़ कर ले और उसे किसी हिदायत की दावत दी जाए तो उससे क़रीबतर हो जाए और किया राहनुमा से वाबस्ता हो जाए तो निजात हासिल कर ले। अपने परवरदिगार को हर वक़्त नज़र में रखे और गुनाहों से डरता रहे। ख़ालिस आमाल को आगे बढ़ाए और नेक आमाल करता रहे। क़ाबिले ज़ख़ीरा सवाब हासिल करे। क़ाबिले परहेज़ चीज़ों से इज्तेनाब करे। मक़सद को निगाहों में रखे। अज्र समेट ले। ख़्वाहिषात पर ग़ालिब आ जाए और तमन्नाओं को झुटला दे। सब्र को निजात का मरकब बना ले और तक़वा को वफ़ात का ज़ख़ीरा क़रार दे ले। रौषन रास्ते पर चले और वाज़ेअ शाहराह को इख़्तेयार कर ले। मोहलते हयात को ग़नीमत क़रार दे और मौत की तरफ़ ख़ुद सबक़त करे और अमल का ज़ादे राह लेकर आगे बढ़े।

77- आपका इरषादे गिरामी (जब सईद बिन अलआस ने आपको आपके हक़ से महरूम कर दिया)

यह बनी उमय्या मुझे मीरासे पैग़म्बर (स0) को भी थोड़ा थोड़ा करके दे रहे हैं हालांके अगर मैं ज़िन्दा रह गया तो इस तरह झाड़ कर फेंक दूंगा जिस तरह क़साब गोष्त के टुकड़े से मिट्टी को झाड़ देता है।

सय्यद रज़ी- बाज़ रिवायात में ‘‘वज़ाम तरबा’’ के बजाए ‘‘तराबुल वज़मा’’ है जो मानी के एतबार से मअकूस तरकीब है। ‘‘लैफ़ू क़ूननी’’ का मफ़हूम है माल का थोड़ा थोड़ा करके देना जिस तरह ऊँट का दूध निकाला जाता है। फवाक़ ऊँट का एक मरतबा का दुहा हुआ दूध है और वज़ाम वज़मा की जमा है जिसके मानी टुकड़े के हैं यानी जिगर या आँतों का वह टुकड़ा जो ज़मीन पर गिर जाए।

(((इसमें कोई शक नहीं है के रहमते इलाही का दाएरा बेहद वसीअ है और मुस्लिम व काफ़िर, दीनदार व बेदीन सबको शामिल है। यह हमेषा ग़ज़बे इलाही से आगे-आगे चलती है। लेकिन रोज़े क़यामत इस रहमत का इस्तेहक़ाक़ आसान नहीं है। वह हिसाब का दिन है और ख़ुदाए वाहिद क़हार की हुकूमत का दिन है। लेहाज़ा उस दिन रहमते ख़ुदा के इस्तेहक़ाक़ के लिये इन तमाम चीज़ों को इख़्तेयार करना होगा जिनकी तरफ़ मौलाए कायनात ने इषारा किया है और इनके बग़ैर रहमतुल लिल आलमीन का कलमा और इनकी मोहब्बत का दावा भी काम नहीं आ सकता है। दुनिया के एहकाम अलग हैं और आख़ेरत के एहकाम अलग हैं। यहां का निज़ामे रहमत अलग है और वहां का निज़ामे मकाफ़ात व मजाज़ात अलग। कितनी हसीन तष्बीह है के बनी असया की हैसियत इस्लाम में न जिगर की है न मेदे की और न जिगर के टुकड़े की। यह वह गर्द हैं जो अलग हो जाने वाले कपड़े से पहले चिपक जाती है लेकिन गोष्त का इस्तेमाल करने वाला इसे भी बरदाष्त नहीं करता है और इसे झाड़ने के बाद ही ख़रीदार के हवाले करता है ताके दुकान बदनाम न होने पाए, और ताजिर नातजुर्बेकार और बदज़ौक़ न कहा जा सके।)))

78- आपकी दुआ (जिसे बराबर तकरार फ़रमाया करते थे)

ख़ुदाया मेरी ख़ातिर उन चीज़ों को माफ़ कर दे जिन्हें तू मुझसे बेहतर जानता है और अगर फिर इन उमूर की तकरार हो तो तू भी मग़फ़ेरत की तकरार फ़रमा। ख़ुदाया उन वादों के बारे में भी मग़फ़िरत फ़रमा जिनका तुझ से वादा किया गया लेकिन इन्हें दफ़ा न किया जा सका। ख़ुदाया उन आमाल की भी मग़फ़ेरत फ़रमा जिनमें ज़बान से तेरी क़ुरबत इख़्तेयार की गई लेकिन दिल ने इसकी मुख़ालेफ़त ही की। ख़ुदाया आँखों के तन्ज़िया इषारों, दहन के नाषाइस्ता कलेमात, दिल की बेजा ख़्वाहिषात और ज़बान की हरज़ह सराइयों को भी माफ़ फ़रमा दे।

79-आपका इरषादे गिरामी

(जब जंगे ख़वारिज के लिये निकलते वक़्त बाज़ असहाब ने कहा के अमीरूल मोमेनीन (अ0) इस सफ़र के लिये कोई दूसरा वक़्त इख़्तेयार फ़रमाएं। इस वक़्त कामयाबी के इमकानात नहीं हैं के इल्मे नुजूम के हिसाबात से यही अन्दाज़ा होता है।)

क्या तुम्हारा ख़याल यह है के तुम्हें वह साअत मालूम है जिसमें निकलने वाले से बलाएं टल जाएंगी और तुम उस साअत से डराना चाहते हो जिसमें सफ़र करने वाला नुक़सानात में घिर जाएगा? याद रखो जो तुम्हारे इस बयान की तस्दीक़ करेगा वह क़ुरान की तकज़ीब करने वाला होगा और महबूब अष्याअ के हुसूल और नापसन्दीदा उमूर के दफ़ा करने में मददे ख़ुदा से बे नियाज़ हो जाएगा। क्या तुम्हारी ख़्वाहिष यह है के तुम्हारे अफ़आल के मुताबिक़ अमल करने वाला परवरदिगार के बजाए तुम्हारी ही तारीफ़ करे इसलिये के तुमने अपने ख़याल में उसे उस साअत का पता बता दिया है जिसमें मनफ़अत हासिल की जाती है और नुक़सानात से महफ़ूज़ रहा जाता है।

अय्योहन्नास! ख़बरदार नुजूम का इल्म मत हासिल करो मगर उतना ही जिससे बरोबहर में रास्ते दरयाफ़्त किये जा सकें। के यह इल्म कहानत की तरफ़ ले जाता है और मुनज्जिम भी एक तरह का काहन (ग़ैब की ख़बर देने वाला) हो जाता है जबके काहन जादूगर जैसा होता है और जादूगर काफ़िर जैसा होता है और काफ़िर का अन्जाम जहन्नम है। चलो, नामे ख़ुदा लेकर निकल पड़ो। 

(((वाज़ेह रहे के इल्मे नुजूम हासिल करने से मुराद उन असरात व नताएज का मालूम करना है जो सितारों की हरकात के बारे में इस इल्म के मुद्दई हज़रात ने बयान किये हैं वरना असल सितारों के बारे में मालूमात हासिल करना कोई ऐब नहीं है। इससे इन्सान के ईमान व अक़ीदे में भी इस्तेहकाम पैदा होता है और बहुत से दूसरे मसाएल भी हल हो जाते हैं और सितारों का वह इल्म जो उनके हक़ीक़ी असरात पर मबनी है एक फ़ज़्ल व शरफ़ है और इल्मे परवरदिगार का एक शोबा है वह जिसे चाहता है इनायत कर देता है। इमाम अलैहिस्सलाम ने अव्वलन इल्मे नजूम को कहानत का एक शोबा क़रार दिया के ग़ैब की ख़बर देने वाले अपने अख़बार के मुख़्तलिफ़ माख़ज़ व मदारक बयान करते हैं। जिनमें से एक इल्मे नजूम भी है। इसके बाद ज बवह ग़ैब की ख़बर में बयान कर देते हैं तो उन्हें क़ब्रों के ज़रिये इन्सान के दिल व दिमाग़ पर मुसल्लत हो जाना चाहते हैं जो जादूगरी का एक शोबा है और जादूगरी इन्सान को यह महसूस कराना चाहती है के इस कायनात में अमल दख़ल हमारा ही है और इस जादू का चढ़ाना और उतारना हमारे ही बस का काम है, दूसरा कोई यह कारनामा अन्जाम नहीं दे सकता है और इसी का नाम कुफ्ऱ है।)))

80- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा (जंगे जमल से फ़राग़त के बाद औरतों की मज़म्मत के बारे में)

लोगों! याद  रखो के औरतें ईमान के ऐतबार से, मीरास के हिस्से के ऐतबार से और अक़्ल के ऐतबार से नाक़िस होती हैं। ईमान के ऐतबार से नाक़िस होने का मतलब यह है के वह अय्यामे हैज़ में नमाज़ रोज़े से बैठ जाती हैं और अक़्लों के ऐतबार से नाक़िस होने का मतलब यह है के इनमें दो औरतों की गवाही एक मर्द के बराबर होती है। हिस्से की कमी यह है के उन्हें मीरास में हिस्सा मर्दों के आधे हिस्से के बराबर मिलता है। लेहाज़ा तुम बदतरीन औरतों से बचते रहो और बेहतरीन औरतों से भी होषियार रहो और ख़बरदार नेक काम भी इनकी इताअत की बिना पर अन्जाम न देना के उन्हें बुरे काम का हुक्म देने का ख़याल पैदा हो जाए।

81-आपका इरषादे गिरामी (ज़ोहद के बारे में)

अय्योहन्नास! ज़्ोहद उम्मीदों के कम करने, नेमतों का शुक्रिया अदा करने और मोहर्रमात से परहेज़ करने का नाम है। अब अगर यह काम तुम्हारे लिये मुष्किल हो जाए तो कम अज़ कम इतना करना के हराम तुम्हारी क़ूवते बरदाष्त पर ग़ालिब न आने पाए और नेमतों के मौक़े पर शुक्रिया को फ़रामोष न कर दुनिया के परवरदिगार ने निहायत दरजए वाज़े और रौषन दलीलों और हुज्जत तमाम करने वाली किताबों के ज़रिये तुम्हारे हर उज़्र का ख़ातमा कर दिया है।

82-आपका इरषादे गिरामी (दुनिया के सिफ़ात के बारे में)

मैं उस दुनिया के बारे में क्या कहूँ जिसकी इब्तिदा रन्ज व ग़म और इन्तेहा फ़ना व पस्ती है। इसके हलालें हिसाब में है और हराम में अक़ाब। जो इसमें ग़नी हो जाए वह आज़माइषों में मुब्तिला हो जाए और जो फ़क़ीर हो जाए वह रन्जीदा व अफ़सरदा हो जाए। जो इसकी तरफ़ दौड़ लगाए उसके हाथ से निकल जाए और जो मुंह फेर कर बैठ रहे उसके पास हाज़िर हो जाए। जो इसको ज़रिया बनाकर आगे देखे उसे बीना बना दे और जो इसको मन्ज़ूरे नज़र बना ले उसे अन्धा बना दे। 

सय्यद रज़ी- अगर कोई शख़्स हज़रत के उस इरषादे गिरामी ‘‘मन अबसर बेहा बसरता’’ में ग़ौर करे तो अजीब व ग़रीब मानी और दूर रस हक़ाएक़ का इदराक कर लेगा जिनकी बलन्दियों और गहराइयों का इदराक मुमकिन नहीं है। ख़ुसूसियत के साथ अगर दूसरे फ़िक़रे ‘‘मन अबसर एलैहा आमतह’’ को मिला लिया जाए तो ‘‘अबसर बेहा’’ और ’’ अबसर एलैहा’’ का र्फ़क़ नुमायां हो जाएगा और अक़्ल मदहोष हो जाएगी।

(((इस ख़ुत्बे में इस नुक्ते पर नज़र रखना ज़रूरी है के यह जंगे जमल के बाद इरषाद फ़रमाया गया है और इसके मफ़ाहिम में कुल्लियात की तरह सूरते हाल और तजुर्बात का भी दख़ल हो सकता है। यानी यह कोई लाज़िम नहीं है के इसका इतलाक़ हर औरत पर हो जाए। दुनिया में ऐसी ख़ातून भी हो सकती है जो निसवानी अवारिज़ से पाक हो। इसकी गवाही बस क़ुरान तन्हा क़ाबिले क़ुबूल हो और वह अपने बाप की तन्हा वारिस हो। ज़ाहिर है के इस ख़ातून में किसी तरह का नुक़्स नहीं पाया जाता है जिसे जनाबे फ़ातेमा (अ0) और ऐसी औरत भी हो सकती है जिसमें सारे नक़ाएस पाए जाते हों और इन फ़ितरी नक़ाएस के साथ किरदारी और ईमानी नक़ाएस भी हों के यह औरत हर एतेबार से क़ाबिले लानत व मज़म्मत हो। क़वानीन का दारोमदार न क़िस्मे अव्वल पर हो सकता है और न क़िस्मे दोम पर। क़वानीन का इतलाक़ दरमियानी क़िस्म पर होता है जिसमें किसी तरह का इम्तियाज़ न पाया जाता हो और सिर्फ़ फ़ितरते निसवानी कार फ़रमाई हो और अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने इसी क़िस्म के बारे में इरषाद फ़रमाया है वरना अगर सिर्फ़ जंगे जमल की बिना पर ग़ैज़ व ग़ज़ब होता तो मर्दों के खि़लाफ़ भी बयान देते जिन्होंने उम्मुल मोमेनीन की इताअत की थी या उन्हें भड़काया था। फिर अमीरूल मोमेनीन (अ0) इमाम मासूम हैं कोई जज़्बाती इन्सान नहीं हैं और इनसे पहले रसूले अकरम (स0) भी यही बात फ़रमा चुके हैं। अलबत्ता यह कहा जा सकता है के इस एलान के लिये एक मुनासिब मौक़ा हाथ आ गया जहां अपनी बात को बख़ूबी वाज़ेअ किया जा सकता है और औरत के इत्तेबाअ के नताएज से बाख़बर किया जा सकता है।)))